30 साल से मेरे सैक्रेटरी के रूप में काम कर रहे लक्ष्मण दास ने पिछली बार मुझसे यह कहने का साहस किया, जब बहनों का दिन रक्षा बंधन, फदर्स डे, मदर्स डे मनाया जाता है तो पत्नी दिवस या पति दिवस क्यों नहीं? क्या वह एक-दूसरे से प्यार नहीं करते या एक-दूसरे के प्रति वफादार नहीं हैं? वह इसे वेलेन्टाइन डे से मिलाना नहीं चाहते थे। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। वह यह भी जानना चाहते थे कि जब एक दम्पति जो 60 या 70 साल से एक साथ रह रहे हों एक-दूसरे में समा गए हों, बेटे बेटियां, पोते-पोतियों के परिवार बसाए हों और उन्हें अपने रक्त और आंसुओं से सींचा हो और उनमें से जब एक की मौत हो जाए तो वह जो अकेला रह गया, कैसे कभी न पूरे होने वाले नुकसान को सहे? अक्सर यह देखा गया है कि ऐसा होने पर पति हो या पत्नी डिप्रेशन में चले जाते हैं और जीने की इच्छा मर जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह भी अपने साथी की राह पकड़ लेते हैं। वह बस यह कहना चाहते थे कि उनकी पत्नी लक्ष्मी इस साल 6 फरवरी को 65 साल का वैवाहिक जीवन पूर्ण कर स्वर्ग सिधार गई थीं।
उन्होंने अपने पूरे जीवन पूरी निष्ठा और श्रद्धा से इनकी सेवा की। उनके अपने शब्दों में 'असल में वह मेरी पूजा करती थीं' वह एक दुर्लभ इंसान यानि कि वास्तविक अर्थों में मानवता की मूर्ति थीं। आज की दुनिया में भगवान तो चाहें आसानी से मिल भी जाएं लेकिन असली इंसान का मिलना बहुत कम है। वह एक ममतामयी मां, बहन और सास का श्रेष्ठ उदाहरण थीं। उनकी चार संतानें (धर्मपाल, दिनेश, पूनम और स्नेहलता) और उनकी बहू पूनम उनकी संक्षिप्त बीमारी के वक्त सेवा करने के लिए हर समय तत्पर रही क्योंकि उन्होंने उनसे बेशुमार लाड़ दुलार किया था, यहां तक कि उनकी मौत भी उनकी बहू पूनम की गोद में हुई। आर्य समाज जनकपुरी में 600 लोगों के समागम में बोलते हुए पूनम के पिता अर्जुन दास ने वहां उपस्थित सभी सासों से कहा कि वह अपनी बहुओं के साथ व्यवहार करने में लक्ष्मी देवी का अनुसरण करें। उनका मूलमंत्र थाः कर्म ही पूजा है और परमात्मा की बनाई हुई हर चीज से प्यार करो। वह मंदिरों और शिवालयों में जाने में विश्वास नहीं करती थीं।
लक्ष्मण दास ने उन्हें मृत्यु का वरण करते हुए देखा था और कहाः
मेरे सामने जो उसने आंखें पर्त लीं
मैं देखता ही रह गया
मेरा दिल घटता गया
और आंखों से दरिया बह गया
अब तकरीबन 6 महीने बीत चुके हैं अभी तक वह इस नुकसान से उबर नहीं पाए हैं। घंटों अकेले बैठे हुए उनकी आंखें डबडबाई रहती हैं। जीवन में उनकी यादों का ही सहारा है। जीवन में उनकी यादों का ही सहारा है। उनके बच्चे उनसे भूलने और आंसू न बहाने के लिए कहते हैं। वह तब मिर्जा गालिब का शेर सुनाते हैं
दिल ही तो है न संग ओ खिश्त
दर्द से भर न आए क्यों
रोएंगे हम हजार बार
कोई हमें सताए क्यों?
उन्होंने मुझे यह राज की बात बताई थी कि तमाम महीनों के बाद उनकी याद पिछले रविवार की रात मन में कौंध गई जिससे उन्हें बहुत तसल्ली मिली और फैज अहमद फैज का यह शेर याद आ गयाः
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीरने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बाद ए नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए
वह अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहते हैं- वह सद्गुणों, विनम्रता, आत्मसम्मान की खान थीं हम सब के लिए एक मार्गदर्शक थीं। परन्तु अब उनके बिना हमारा घर बंजर हो गया है।
उनके न होने से यह जगह वीरना बन गई है।
यह सच है कि व्यक्ति हर क्षण मरता है और हर क्षण जीता है, लेकिन वह प्रतीक्षा में रहता है।
'मेरे घर में तुम पूर्णमासी का चन्द्रमा थीं,
क्या कुछ समय और अपनी रोशनी से सराबोर नहीं कर सकती थीं'
अलौकिक शांति
पुराने घर के सभी कोनों में रोशनी हो गई है
बीच के कमरे में
कोफिन रखा है
वृद्ध महिला के चेहरे पर अब दर्द की शिकन नहीं है
बल्कि शांति और पावनता है
पादरी प्रार्थना करते हुए पवित्र जल छिड़कता है
पड़ोसियों का चेहरा दुखी, लेकिन अंदर राहत महसूस करते हुए
उन्हें अब अकेला छोड़ने में कोई अपराध बोध नहीं होता
उनके अपने क्रास हैं वह अब मुक्त हैं इसी तरह यह वृद्ध महिला अनन्त शांति में विश्राम के लिए प्रस्थान कर चुकी है।
पत्नी द्वारा दिया संदेश
प्रिय सासू मां मुझे मत सिखाओ कि अपने बच्चों को मैं कैसे संभालूं। मैं तुम्हारे एक बच्चे के साथ रह ही रही हूं जिसे सुधार की बहुत जरूरत है।
बच्चे की स्वीट डिमांड
एक बच्चे को उनकी मां से मार पड़ी, पिता आए और पूछाः 'बेटे क्या हुआ?' बेटे ने कहाः 'मैं आपकी पत्नी के साथ और ज्यादा समझौता नहीं कर सकता, मुझे अपनी चाहिए।
(विपिन बक्शी ने दिल्ली से भेजा) - खुशवंत सिंह
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