Monday, October 29, 2012

सन् 1962 से हमने सीखा क्या?



 

इस अक्टूबर में सिवाय भारत की लूट और शासन द्वारा देश के भ्रष्टशाही घराने के संरक्षण की आवाजों के और क्या सुनाई देता है?

इतनी अधिक बड़ी राशि के घोटालों का शोर है कि अब इन राशियों को गिनने का ही मन नहीं होता। इतना ही जानना पर्याप्त लगता है कि कारवां लुट गया। एक वे थे जो पचास साल पहले देश की रक्षा के लिए बिना किसी न्यूनतम सामग्री और तैयारी के, चुशूल की हड्डियाँ कंपने वाली ठंड में आखिरी गोली और आखिरी फौजी तक घमासान युद्ध कर दुश्मनों से लड़ते हुए बलिदान हो गए, अपना सब कुछ देश के लिए न्योछावर कर दिया।

वह भी एक अक्टूबर था। उस अक्टूबर को याद करते हुए लता जी ने गाया था−

जब देश में थी दिवाली, वे खेल रहे थे होली।
जब हम बैठे थे घरों में, वे झेल रहे थे गोली।

इस अक्टूबर को देश गुड़गाँव की अपार संपत्तियां, देश के लगभग हर बड़े महानगर में अपार भूमि खरीद, आलीशान जिन्दगी के नए मानक स्थापित करने वाले नेताओं के अहंकारपूर्ण बयानों और उनके मिमियाते से दरबानों की हास्यास्पद रक्षा पंक्तियों को झेल रहा है।

हताशा इतनी है कि अब वोट तक देने की इच्छा नहीं होती।

किसको वोट दें? वे जो बासठ में देश की आयुध निर्माणशालाओं में काफी की मशीनें और लिपिस्टिक बनवा रहे थे और बयान दे रहे थे कि भारत को सेना की जरूरत नहीं क्योंकि हमारा कोई शत्रु नहीं है? 1949 में सरदार पटेल ने नेहरू को पत्र लिखा था कि चीन तिब्बत पर नजर रखे हुए है, हमें सावधान रहना होगा। तिब्बत के साथ हमारा शताब्दियों पुराना व्यापारिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और रणनीतिक सम्बन्ध रहा है। उसको भारत के हित में चीन से बचाना जरूरी है। लेकिन उल्टे नेहरू ने पत्र के जवाब में कहा− चीन ऐसा कभी नहीं करेगा। यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि चीन तिब्बत को हड़प सकता है। भारत से तिब्बत का सम्बन्ध पूरी तरह काटना मोत्सेतुंग का सामरिक उद्देश्य था। तिब्बत का हान− करण यानी चीनीकरण भारत को इस अत्यंत प्राचीन भारतीय प्रभाव और गहन आत्मीयता के क्षेत्र से पूरी तरह अनुपस्थित करने का षड़यंत्र था। ऐसा ही हुआ। तिब्बत सिर्फ विदेश ही नहीं हुआ, तिब्बत चीन हो गया।

पंडित नेहरू ने बाद में स्वयं अपनी मायावादी नीतियों की निरर्थकता स्वीकार की। बासठ के हमले ने उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि और स्वदेशी नेतृत्व को ध्वस्त कर दिया। उस हार ने नेहरू की मृत्यु को भी निकट ला दिया। नेहरू ने बासठ के हमले के बाद राष्ट्र को संबोधन में कहा−हम अपनी ही दुनिया में रह रहे थे और दुश्मन हम पर घात लगाये हुए था।

पचास का दशक भारत के नव निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का था, पर चीन अक्साई चीन पर कब्जा कर रहा था और भारत को पता ही नहीं चला। संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी बार−बार चीन की हलचलों पर आवाज उठाते रहे पर नेहरू सरकार उसे अपनी अन्तर्राष्ट्रीय मित्रता की मृगमरीचिका में उपेक्षित करती रही। सन् 1947 में पाकिस्तान के हमले और सन् 1950 में चीन के अक्साईचीन पर कब्जे ने भारत की एक लाख पचीस हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हमसे अलग कर दी जिसे पुनः वापस लेने की हिम्मत और ताकत कहीं दिखती नहीं।

20 अक्टूबर से सोलह नवम्बर तक चीन ने भारत के दो दूरस्थ सीमान्तों पर दो बार हमला किया। उस समय अरुणाचल प्रदेश नेफा (छम्थ्।) यानी नार्थ−ईस्ट फ्रंटीयर एजेंसी कहा जाता था। चीन का एक साथ हमला लद्दाख और नेफा पर हुआ। उसने भारत के दोनों ओर की सीमान्त चौकियों पर कब्जा कर लिया। लद्दाख में चुशूल के पास त्रिशूल पर्वत उसके पास चला गया। नेफा में तेजपुर तक उसकी सेना आ गयी। आकाशवाणी से दिए अपने संबोधन में नेहरू ने रुंधे गले और भीगी आँखों से असम निवासियों को विदाई दी थी।

हेनरी किस्सिंगर ने हाल ही में पुस्तक लिखी है− चीन पर। उसकी शुरुआत में ही पहले अध्याय का पहला अनुच्छेद भारत पर चीन के हमले से शुरू होता है। माओ के साथ अपनी मुलाकात में किस्सिंगर ने पूछा था− आपने भारत पर हमला क्यों किया और किया भी तो स्वयं युद्धविराम कर अपनी सेना वापस क्यों बुला ली, जबकि भारत प्रतिरोध की स्थिति में था ही नहीं?
माओ ने तनिक विचार कर कहा− चीन भारत को ठिठ्काना चाहता था।

यह पुरानी चीनी रणनीति है। उनकी युद्ध कला का अंश।
प्रतिस्पर्धी को दहशत में रखो। पूरी तरह कुचलने में शक्ति व्यर्थ करने का कोई अर्थ नहीं।

चीन ने उस समय भारत पर हमला किया था, जब क्यूबा में अमरीका उलझा हुआ था और अमरीका तथा सोवियत संघ के बीच मिसाइल युद्ध होने की आशंका प्रबल थी। सोवियत संघ के खुश्चेव चीन के साथ दोस्ती के इच्छुक थे ताकि अमरीका के खिलाफ उसको समर्थन मिले। ऐसी स्थिति में न तो अमरीका से और न ही सोवियत संघ से भारत को किसी तात्कालिक मदद की सम्भावना हो सकती थी। नेहरू केनेडी से सहायता मांगते रहे लेकिन कुछ नहीं मिला। न ही सोवियत संघ ने कुछ किया। एक ही देश था जिसने भारत से मान्यता न मिलने की स्थिति में भी सहायता की और वह था इस्राइल।
भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भीतर से ही चीन के साथ खड़े हो गए थे और सार्वजनिक प्रदर्शन कर चीन की वकालत करते हुए 'भारत द्वारा चीन पर हमले' की निंदा करने लगे थे। परिणामस्वरूप ढाई सौ कम्युनिस्ट नेता, जिनमें नम्बूदरीपाद भी थे नेहरू सरकार द्वारा देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये गए थे। उसी दौर में सेकुलर सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की देशभक्तिपूर्ण सेवा और सैनिकों को दिए समर्थन के अभिनंदनार्थ सन् 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में उनको पूर्ण संघ गणवेश में शामिल होने का निमंत्रण दिया था।

नेहरू उस समय अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के चरम पर थे। मित्रता, पंचशील, करुणा और कविताओं का दौर भारत की विदेश नीति और रक्षा नीति को परिभाषित कर रहा था। 1956 में जब अक्साई चीन पर चीनी कब्जे का मामला उठा तो नेहरू ने कहा− वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता। तब रक्षा राज्य मंत्री थे देहरादून से लोकसभा में चुने गए कांग्रेस नेता महावीर प्रसाद त्यागी। उनसे रहा नहीं गया और उठकर वे बोले− ऐसा मत कहिये, उगता तो आपके सर पर भी कुछ नहीं है। पर वो दौर ही कुछ और था।

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में भयंकर कमजोरियां चीन के हमले ने उजागर कर दीं। भारत के सैनिक साधारण जुराबों, पतले स्वेटर, बेकार जैकटों और पुराने द्वितीय विश्व युद्ध के हथियारों से लड़े।
उनकी बहादुरी और वीरता की अप्रतिम कथाएं चुशूल से तवांग तक बिखरी हुई हैं। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतानसिंह की अहीर पलटन ने चीनियों के खेमे में तबाही मचा दी थी। 4 गढ़वाल राइफल के राइफलमैन जसवंतसिंह रावत ने नेफा में तवांग−सेला सेक्टर में जो कमाल का शौर्य दिखाया उसने न केवल उसे मरणोपरांत महावीर चक्र दिलवाया, बल्कि सेना ने सेला सेक्टर को जसवंतगढ़ का ही नाम दे दिया। सेना की वह बहादुरी और पराक्रम अद्भुत रहा।

लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने भारत के साथ विश्वास भंग किया।

चीन ने सन् 1962 में अपनी और से हमला किया, लद्दाख में तो वह तीन महीने तक बैठा रहा। और फिर एक दिन अपनी ओर से ही युद्ध विराम कर वापस लौट गया। वह चाहता तो नेफा और लद्दाख के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमाये बैठा रह सकता था। भारत के पास उसे खदेड़ने की शक्ति नहीं थी। पर चीन भारत को विश्व में लज्जित कर, तिब्बत में कुछ न करने की चेतावनी और उसे सदैव दहशत में रहने के उद्देश्य से आया था और उसमें सफल होकर लौट गया।

यही मोत्सेतुंग की रणनीति थी।

सन् 1962 में भारत के सैनिक जीते थे पर दिल्ली के राजनेता हारे थे। और फिर हमने अपने सैनिकों के लिए क्या किया? कुछ नहीं सिवाय अपमान और तिरस्कार, सिवाय उनको आई.ए.एस. बाबुओं के भरोसे छोड़ने के, सिवाय उनके साथ धोखा करने के।

पूरे देश में आज एक भी शानदार ऐसा युद्ध स्मारक या विजय स्तम्भ नहीं है जो भारतीय सैनिकों के यश को सार्थकता के साथ अभिव्यक्त करता हो। वन रैंक, वन पेंशन की मांग को लेकर सैनिक संगठन बरसों से लड़ते रहे, जंतर−मंतर पर धरने देते रहे, पर किसी पार्टी ने उनके साथ न्याय नहीं किया। अभी हाल ही में सरकार ने जो घोषणा की है उसको सैनिकों ने अपने साथ छल और विश्वासघात कहा है। यह हमारे घावों पर नमक छिड़कने के समान है, ऐसा सेना के अवकाश प्राप्त जनरल कहते हैं। परमवीर चक्र से लेकर अशोक चक्र और कीर्तिचक्र जीतने वाले बहादुरों को सरकार ढाई हजार रुपये से लेकर पचास हजार रुपये तक की वार्षिक पेंशन देती थी। उसे सबसे पहले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल खंडूरी ने एकमुश्त अनुदान पचास से पचीस लाख रुपये और पचीस हजार रुपये मासिक की पेंशन में बदला। लेकिन आज भी अनेक सरकारों ने उसे अपनाया नहीं है। सैनिक की शिकायतों पर स्थानीय प्रशासन भी ध्यान नहीं देता, उसके लिए राजनीतिक शोर मचने वाले ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

जैसे हमने गंगा को तिरस्कृत कर गन्दा बना दिया, वैसे ही हमने सैनिक की बहादुरी को भी अपमानित कर युवकों के लिए सेना में जाना छठे पांचवें दर्जे की प्राथमिकता में बदल दिया।

सन् 1962 से हमने सीखा क्या?

उस समय चीन का भारत पर हमला था।

अब भारतीयों का ही भारत पर हमला है। लूट और भ्रष्टाचार का हमला।

इस अक्टूबर का यही प्रश्न है।
                                                                                                                                        तरुण विजय

Monday, October 15, 2012

नेवी की नौकरी छोड़ घुमक्कड़ लेखन के क्षेत्र में बनाई पैठ




यात्रा-वृतांत लेखन में ह्यूज गैंट्जर और कौलीन गैंट्जर ने अलग मुक़ाम बनाया है। हालांकि शुरू में ह्यूज लेखन को लेकर गंभीर नहीं थे, हालांकि उन्हें घुमक्कड़ी का शौक़ था। लेकिन भारतीय नेवी में रहने की वजह से अपने इस शौक़ को वे पूरा नहीं कर पाते थे। तब उन्होंने भारतीय नेवी की नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया और घुमक्कड़ लेखन के क्षेत्र में अपनी पैठ बनाई। अच्छी बात यह रही कि पत्नी कौलीन ने इस क्षेत्र में आने के लिए न सिर्फ उन्हें प्रेरित किया बल्कि ख़ुद भी घुमक्कड़ी में उनका साथ दिया। नेवी की नौकरी छोड़ने के बाद ह्यूज ने अख़बारों में यात्रा-संस्मरणों पर कॉलम लिखना शुरू किया। ह्यूज को सफ़रनामा लिखने वाले पहले क़ॉलमनवीस होने का गौरव हासिल है। बाद में उन्होंने टीवी पर इस सिलसिले को जारी रखा और अपने यात्रा वृतांत को बावन एपीसोड में पेश कर नई नज़ीर कायम की थी। ह्यूज ने अपने लेखन से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घुमक्कड़ लेखक के तौर पर पहचान बनाई। गैंट्जर दंपति के बारे में यह बात मशहूर है कि साल में छह महीने दोनों सफ़र पर रहते हैं और घुमक्कड़ी के अनुभवों को साझा करते हैं।
गैंट्जर दंपति भारत को अपने तरीक़े से देखने और समझने की कोशिश करते हैं और हर यात्रा के बाद कुछ नया अनुभव बटोर लाते हैं। दोनों ने यात्राओं के इस सिलसिले को अब भी बरक़रार रखा है। अपनी यात्राओं को उन्होंने जिस रूप-रंग में देखा है उन्होंने उसे क़लमबंद भी किया है। घुमक्कड़ी पर उनकी दो पुस्तकें ‘द वाईब्रेंट वेस्ट’ और ‘द हिस्टोरिक साउथ’ में इसका अक्स देखा जा सकता है। इन किताबों के ज़रिए जीवन के राग-विराग को तो देखने-समझने में मदद मिलती ही है, संस्कृतियों, कलाओं और परंपराओं को भी बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। दोनों ही किताबें भारत के इतिहास, कला, संस्कृति और परंपरा को हमारे सामने रखती हैं। अच्छी बात यह है कि इन पुस्तकों में लेखकों ने बातचीत की शक्ल में भारतीय परंपरा, संस्कृति और कलाओं को हमारे सामने रखा है जो पढ़ने में एक अलग तरह का मज़ा देती है। फिर पन्ने-पन्ने पर छपी तस्वीरें जीवन के कई-कई रंगों को हमारे सामने लाकर रखती हैं, उन रंगों में हम अपने देश की विरासत, सभ्यता, संस्कृति, पर्व-त्यौहारों का अक्स देखते हैं। वे तस्वीरें बहुत शिद्दत से हमसे बोलती-बतियाती हुई न सिर्फ हमें अपनी अतीत से जोड़ती हैं बल्कि वर्तमान को भी सामने रखती है।
‘द वाईब्रेंट वेस्ट’ के शुरुआती आलेख में भारत के पहले शहर धोलावीर की जानकारी मिलती है। लेखक द्वय ने 2006 बीसी में आबाद इस भारतीय शहर की जानकारी दी है। इसके अलावा अजमेर, जैसलमेर, अनासागर सहित दूसरी जगहों का ज़िक्र विस्तार के साथ किया गया है। ‘द हिस्टोरिक साउथ’ में दक्षिण के राज्यों में फैली हमारी संस्कृति और सभ्यता को सामने रखा गया है। गोलकुंडा, हंपी, उडुपी, चारमीनार का ज़िक्र विस्तार के साथ मिलता है फिर इन शहरों के जीवन-दर्शन को भी नज़दीक से देखने की कोशिश की गई है। दोनों किताबें घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए बेहतरीन तोहफ़ा है। यों तो किताबें अंग्रेजी में हैं, लेकिन हिंदी के पाठकों को भी यह पुस्तक पसंद आएगी क्योंकि भाषा सरल और सहज है और इनमें देश के इन हिस्सों के कई ऐसे अनछुए पहलू को हमारे सामने रखा गया है जिनसे हम पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं थे।
पुस्तकः द हिस्टोरिक साउथ, द वाईब्रेंट वेस्ट (यात्रा वृतांत)।
लेखक: ह्यूज गैंट्जर और कौलीन गैंट्जर।
प्रकाश्क: नियोगी बुक्स, डी-78, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया-फेज एक, नई दिल्ली-110020।
मूल्य: 395 रुपए प्रत्येक।                                                   - फ़ज़ल इमाम मल्लिक                            - फ़ज़ल इमाम मल्लिक




रोजगार के खुलते नए द्वार, बढ़ता पर्यटन



भ्रमण का शौक एक अच्छा और रोचक रोजगार बन सकता है। टूरिज्म और ट्रेवल का क्षेत्र आज असीम संभावनाओं वाला क्षेत्र बन चुका है। हमारे विभिन्न ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थल देश−विदेश के सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। भारत में अनगिनत मंदिरों, किलों, पहाड़ों, जंगलों, समुद्र तटों आदि दर्शनीय स्थलों के अलावा यहां का प्राकृतिक सौंदर्य लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। विदेशी पर्यटकों के साथ−साथ स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में भी आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। इन पर्यटकों की यात्रा, आवश्यकताओं और सुख−सुविधाओं के प्रबन्धन के क्षेत्र में अनेक सम्भावनाओं के द्वार खुले हुए हैं।
नवीनता, चमक−दमक, भ्रमण, जीवन्तता आदि से भरपूर इस क्षेत्र में रोजगार की दृष्टि से युवा वर्ग के लिए भरपूर सम्भावनाएं हैं। देशी−विदेशी पर्यटक एडवेंचर, मौजमस्ती, भ्रमण, खेल, मनोरंजन, नये−नये स्थानों, ऐतिहासिक इमारतों, प्राकृतिक सौंदर्य आदि को देखने को लालायित रहते हैं। अपरिचित स्थान और लोगों से सामना होने पर अनेक प्रकार की परेशानियों से सामना होता है और पूछताछ−खोज आदि में समय और धन भी बरबाद होता है। इन पर्यटकों के लिए विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने और उनकी सहायता के लिए योग्य और प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता निरन्तर बढ़ रही है। इस क्षेत्र को कॅरियर के रूप में अपनाने के लिए टूअर एवं टे्रवल एजेंसी, ट्रांसपोर्ट के की कार्य प्रणाली के बारे में जानकारी रखना उपयोगी सिद्ध होगा।
भारत भर में अनेकानेक ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक, वन्य प्राणी आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल हैं। इन्हें देखने के लिए आने वाले पर्यटकों को घुमाने, यात्रा की सही योजना बनाने, पर्याप्त जानकारी देने, रेल, बस, टैक्सी, हवाई जहाज द्वारा यात्रा के शुल्क आदि की विस्तृत विवरण देने, उनके रहने−खानपान का प्रबन्ध करने, लाइसेंस धारक गाइड और आवश्यकतानुसार दुभाषिये का प्रबन्ध करने जैसे अनेक कार्य एक टूअर व ट्रेवल एजेंसी की जिम्मेदारी में शामिल होते हैं। आजकल पैकेज टूअर का चलन है। किसी पर्यटक के लिए इसकी पूरी योजना बनाना माथापच्ची का काम है। योजनाकार को सम्बन्धित स्थानों के बारे में पर्याप्त जानकारी होना आवश्यक है। वहां के भूगोल, इतिहास, मौसम आदि की जानकारी आवश्यक होती है।
पूरी यात्रा के लिए ट्रांसपोर्ट की उचित व्यवस्था करना भी महत्वपूर्ण कार्य है। पैकेज टूअर में विभिन्न स्थलों तक पहुंचाने, यात्रा, होटल आदि में ठहरने, नाश्ता−भोजन और उसकी अवधि आदि का विशेष महत्व होता है। अधिकांश पर्यटक अपनी इच्छा और अपनी जेब को ध्यान में रखकर ही यात्रा करना चाहते हैं। वे इसे ध्यान में रखकर ही सही लगने वाले पैकेज टूअर चुनते हैं। यदि किसी पर्यटक को उपलब्ध कराई जाने वाली तय सुविधाओं में कमी रह जाएगी तो इससे एजेंसी के साथ−साथ देश की छवि भी खराब होगी। अतः हर पर्यटक को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। 'अतिथि देवो भव' को सदा ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ऊर्जावान युवा वर्ग को इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के लिए उचित प्रशिक्षण लेने के साथ−साथ एकाधिक भाषाएं भी सीखनी चाहिए। इतिहास, भूगोल, संस्कृति, मौसम, परम्पराओं, रीतिरिवाजों आदि के बारे में पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए। साथ ही कलात्मक अभिरुचि, मिलनसार स्वभाव, चेहरे पर मुसकान आदि कुछ ऐसे गुण हैं जिन्हें अपनाना लाभदायक सिद्ध होता है। हमारे यहां इस क्षेत्र में प्रवेश के इच्छुक लोगों के प्रशिक्षण की सरकारी−गैरसरकारी स्तर पर कुछ शहरों में व्यवस्था है। प्रवेश लेने से पहले सम्बन्धित संस्थान और उसके शुल्क के अलावा प्लेसमेंट के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। इस क्षेत्र में कार्य और अनुभव के अनुसार हर माह 15−20 हजार या अधिक रुपये आसानी प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद कुछ समय किसी एजेंसी में कार्य कर अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद साधन जुटाकर अपनी एजेंसी आरम्भ की जा सकती है। तब जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ−साथ आमदनी और लाभ में भी कई गुना बढ़ोत्तरी हो जाती है।
'प्रशिक्षण संस्थान'
− इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एण्ड टेवल मैनेजमेंट, दिल्ली चैप्टर−1, न्याय मार्ग, चाणक्य पुरी, नयी दिल्ली −110021
(एयर ट्रेवल, फेयर एण्ड टिकटिंग के अल्पावधि पाठ्यक्रम, कम्प्यूटरीकृत आरक्षण,)
- इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनीवर्सिटी, (इग्नू), मैदान गढ़ी, नयी दिल्ली−110068
− कोटा ओपन यूनीवर्सिटी, कोटा, राजस्थान
− कुरुक्षेत्र, अन्नामलाई और मदुराई विश्वविद्यालय में पत्राचार पाठ्यक्रम उपलब्ध
− दिल्ली, कुरुक्षेत्र, रोहतक, शिमला, बनारस, गोवा, मद्रास, आगरा, उत्कल (भुवनेश्वर, उड़ीसा), अलीगढ़, मुंबई, बिलासपुर, आदि में 'अल्पावधि व पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पाठ्यक्रम'
− इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एण्ड टेवल मैनेजमेंट (आईआईटीटीएम),
'अल्पावधि व पोस्ट ग्रजुएशन डिप्लोमा पाठ्यक्रम'
− भारतीय विद्या भवन, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नयी दिल्ली−110001
− स्काई लाइन बिजनेस स्कूल, हौज खास एन्क्लेव, नयी दिल्ली
− सीता अकादमी, एम−135, कनॉट प्लेस, नयी दिल्ली−110001
'पत्राचार पाठ्क्रम '(डिप्लोमा)
−कर्नाटक स्टेट ओपन यूनीवर्सिटी, मनसा, गंगोत्री, मैसूर−570006, कर्नाटक
−राजश्री टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, सत्रह महर्षि दयानन्द मार्ग, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

अधिक जानकारी के लिए इंटरनेट पर भी खोज की जा सकती है।             -अमित भंडारी 

सच्चे दोस्त दिखाते हैं मुश्किल में रास्ता

बीते दो-तीन दशकों में जिस तेजी से दुनिया बदली है, उसी गति से मानवीय रिश्तों में भी बदलाव आया है। एक समय था जब मैत्री का विशिष्ट अर्थ था, चाहे वह दो समुदायों के बीच हो या दो देशों के बीच। दो व्यक्तियों के बीच भी मित्रता में विश्वास का बड़ा महत्व था, जिसे ईमानदारी से निभाया जाता था। पौराणिक आख्यानों में राम-सु्ग्रीव मैत्री एक ऐसा उदाहरण है, जो भारतीय मानस पटल पर आज भी अंकित है। इस मैत्री से आज की उस युवा पीढ़ी को सीखना चाहिए जो दोस्ती को 'फास्ट फूड' की तरह समझते हैं या जो सिर्फ 'यूज' करने के लिए दोस्त बनाते हैं। मैत्री अनायास ही कब और किससे हो जाए, कहा नहीं जा सकता। मगर आजकल फ्रेंडशिप डे पर दोस्त बनाने का एक नया चलन शुरू हुआ है। फ्रेंडशिप बैंड बेचने की आड़ में दोस्तों के बीच बाजार भी घुस आया है।
दौर बेशक बदल जाए मगर दोस्ती में अपेक्षाएं कभी नहीं बदलतीं। खासतौर से निस्वार्थ भावना और एक दूसरे पर विश्वास। युवा पीढ़ी में कुछ युवा अपवाद हो सकते हैं, मगर वह भी यही चाहती है कि मित्र 'संकट' के समय साथ न छोड़े। इसीलिए सच्चा दोस्त एक दुआ है। भगवान का आशीर्वाद है। बुरे वक्त का साथी है। कभी परेशान हो तो, वह हंसाने आ जाता है, कभी मुश्किल में हैं तो वह आपको सही रास्ता दिखाता है। दोस्ती का यह रिश्ता अफेक्शन, विश्वास और ईमानदारी पर टिका होता है। सच्चा दोस्त आपके जीवन को खुशियों से भर देता है। आपको खास महसूस कराता है, और आपका बेहद ध्यान रखता है। सबसे बड़ी बात यह कि एक अच्छा दोस्त आपके जीवन की पूंजी होता है, जिसे आप हमेशा सहेज कर रखना चाहते हैं।
मगर आज दोस्ती पहले जैसी नहीं रही। अब न तो वह मदद की भावना रह गई न ही मुश्किलों में साथ देने का जज्बा। छोटी-छोटी बात पर दोस्तों के बीच मतभेद हो जाना आम बात है। दोस्ती में दगा पहले भी लोग देते थे मगर हजारों में एक अपवाद होता था। मगर आज आए दिन ऐसी खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं कि एक ने दूसरे दोस्त को चाकू घोंपा। या फिर दोस्त ने भी अगवा करा कर फिरौती मांगी। या फिर दोस्त ने ही पत्नी को प्रेमजाल में फंसाया। दोस्ती में विश्वासघात की ऐसी खबरें विचलित कर देती हैं।
पिछले कुछ सालों में सामने आई फ्रेंड साइटों पर दोस्ती के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। मगर इसके पीछे का सच कुछ और ही होता हैं। अपनी पहचान छुपाकर, अपनी उम्र छुपाकर लोग दोस्ती के नाम पर धोखा देते हैं। मुश्किलों में साथ निभाने का वादा करके सामने वाले के लिए मुश्किल खड़ी कर देते हैं। छोटी उम्र की टीनेज लड़कियां ऐसी दोस्ती की जाल में आसानी से फंस जाती हैं फिर उम्र भर के लिए पछताती हैं।
दोस्ती के नाम पर कई लड़के भावुक लड़कियों को धोखा देते हैं और उनका फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। हाल में किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि कोई भी युवक या पुरुष किसी युवती या महिला का दोस्त नहीं हो सकता। शोधकर्ताओं की मानें, तो किसी भी युवक का युवती से दोस्ती करना मात्र यौनाकर्षण होता है। अगर महिलाओं की मानें तो वह किसी युवक से दोस्ती करते वक्त सिर्फ यही सोचती हैं कि वे उनके अच्छे दोस्त बनेंगे। मगर ऐसा होता नहीं।
जीवन में ऐसे कुछ लोग भी मिलते हैं, जिनसे उम्र के आखिरी पड़ाव तक दोस्ती निभाई जा सकती है। ऐसे दोस्तों में दूसरे दोस्त से न तो जलन की भावना होती है और न ही उनसे कोई गिला-शिकवा होता है। ऐसे व्यक्ति अपने दोस्त की हर बात सुनते हैं, हर परेशानी में साथ देते हैं। उनका दुख-सुख बांटते हैं। एक तरफ जहां बदलते दौर में दोस्ती की परिभाषा बदली है वहीं आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो दोस्ती का मतलब जानते हैं। भागती-दौड़ती जिंदगी में भले ही वे एक दूसरे साथ वक्त न बिता पाएं, पर संपर्क में जरूर रहते हैं और जीवन की अच्छे-बुरे अनुभव भी बांटते हैं।

आजकल के युवाओं को रक्षाबंधन से ज्यादा इंतजार फ्रेंडशिप डे का होता है। इस दिन वे अपने दोस्त को फ्रेंडशिप बैंड बांधकर यह जताते हैं कि वे उनके सच्चे दोस्त हैं। बैंड बांधने के साथ-साथ अब तो इस दिन दोस्तों को तोहफे भी दिए जाते हैं। पर जिन युवाओं को नई दोस्ती की नींव रखनी है उनके लिए 'फ्रेंडशिप डे' से बेहतर दिन और कोई नहीं। और फ्रेंडशिप बैंड ऐसा बंधन है, जिसे आज के दौर में पूरे भरोसे और ईमानदारी के साथ कोई निभा ले, तो वह बड़ी बात होगी।                                                                          -  ईशा        

Thursday, October 11, 2012

जीवन भर के साथी का बिछड़ जाना ...!


30 साल से मेरे सैक्रेटरी के रूप में काम कर रहे लक्ष्मण दास ने पिछली बार मुझसे यह कहने का साहस किया, जब बहनों का दिन रक्षा बंधन, फदर्स डे, मदर्स डे मनाया जाता है तो पत्नी दिवस या पति दिवस क्यों नहीं? क्या वह एक-दूसरे से प्यार नहीं करते या एक-दूसरे के प्रति वफादार नहीं हैं? वह इसे वेलेन्टाइन डे से मिलाना नहीं चाहते थे। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। वह यह भी जानना चाहते थे कि जब एक दम्पति जो 60 या 70 साल से एक साथ रह रहे हों एक-दूसरे में समा गए हों, बेटे बेटियां, पोते-पोतियों के परिवार बसाए हों और उन्हें अपने रक्त और आंसुओं से सींचा हो और उनमें से जब एक की मौत हो जाए तो वह जो अकेला रह गया, कैसे कभी न पूरे होने वाले नुकसान को सहे? अक्सर यह देखा गया है कि ऐसा होने पर पति हो या पत्नी डिप्रेशन में चले जाते हैं और जीने की इच्छा मर जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह भी अपने साथी की राह पकड़ लेते हैं। वह बस यह कहना चाहते थे कि उनकी पत्नी लक्ष्मी इस साल 6 फरवरी को 65 साल का वैवाहिक जीवन पूर्ण कर स्वर्ग सिधार गई थीं।
उन्होंने अपने पूरे जीवन पूरी निष्ठा और श्रद्धा से इनकी सेवा की। उनके अपने शब्दों में 'असल में वह मेरी पूजा करती थीं' वह एक दुर्लभ इंसान यानि कि वास्तविक अर्थों में मानवता की मूर्ति थीं। आज की दुनिया में भगवान तो चाहें आसानी से मिल भी जाएं लेकिन असली इंसान का मिलना बहुत कम है। वह एक ममतामयी मां, बहन और सास का श्रेष्ठ उदाहरण थीं। उनकी चार संतानें (धर्मपाल, दिनेश, पूनम और स्नेहलता) और उनकी बहू पूनम उनकी संक्षिप्त बीमारी के वक्त सेवा करने के लिए हर समय तत्पर रही क्योंकि उन्होंने उनसे बेशुमार लाड़ दुलार किया था, यहां तक कि उनकी मौत भी उनकी बहू पूनम की गोद में हुई। आर्य समाज जनकपुरी में 600 लोगों के समागम में बोलते हुए पूनम के पिता अर्जुन दास ने वहां उपस्थित सभी सासों से कहा कि वह अपनी बहुओं के साथ व्यवहार करने में लक्ष्मी देवी का अनुसरण करें। उनका मूलमंत्र थाः कर्म ही पूजा है और परमात्मा की बनाई हुई हर चीज से प्यार करो। वह मंदिरों और शिवालयों में जाने में विश्वास नहीं करती थीं।
लक्ष्मण दास ने उन्हें मृत्यु का वरण करते हुए देखा था और कहाः
मेरे सामने जो उसने आंखें पर्त लीं
मैं देखता ही रह गया
मेरा दिल घटता गया
और आंखों से दरिया बह गया
अब तकरीबन 6 महीने बीत चुके हैं अभी तक वह इस नुकसान से उबर नहीं पाए हैं। घंटों अकेले बैठे हुए उनकी आंखें डबडबाई रहती हैं। जीवन में उनकी यादों का ही सहारा है। जीवन में उनकी यादों का ही सहारा है। उनके बच्चे उनसे भूलने और आंसू न बहाने के लिए कहते हैं। वह तब मिर्जा गालिब का शेर सुनाते हैं
दिल ही तो है न संग ओ खिश्त
दर्द से भर न आए क्यों
रोएंगे हम हजार बार
कोई हमें सताए क्यों?
उन्होंने मुझे यह राज की बात बताई थी कि तमाम महीनों के बाद उनकी याद पिछले रविवार की रात मन में कौंध गई जिससे उन्हें बहुत तसल्ली मिली और फैज अहमद फैज का यह शेर याद आ गयाः
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीरने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बाद ए नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए
वह अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहते हैं- वह सद्गुणों, विनम्रता, आत्मसम्मान की खान थीं हम सब के लिए एक मार्गदर्शक थीं। परन्तु अब उनके बिना हमारा घर बंजर हो गया है।
उनके न होने से यह जगह वीरना बन गई है।
यह सच है कि व्यक्ति हर क्षण मरता है और हर क्षण जीता है, लेकिन वह प्रतीक्षा में रहता है।
'मेरे घर में तुम पूर्णमासी का चन्द्रमा थीं,
क्या कुछ समय और अपनी रोशनी से सराबोर नहीं कर सकती थीं'
अलौकिक शांति
पुराने घर के सभी कोनों में रोशनी हो गई है
बीच के कमरे में
कोफिन रखा है
वृद्ध महिला के चेहरे पर अब दर्द की शिकन नहीं है
बल्कि शांति और पावनता है
पादरी प्रार्थना करते हुए पवित्र जल छिड़कता है
पड़ोसियों का चेहरा दुखी, लेकिन अंदर राहत महसूस करते हुए
उन्हें अब अकेला छोड़ने में कोई अपराध बोध नहीं होता
उनके अपने क्रास हैं वह अब मुक्त हैं इसी तरह यह वृद्ध महिला अनन्त शांति में विश्राम के लिए प्रस्थान कर चुकी है।
पत्नी द्वारा दिया संदेश
प्रिय सासू मां मुझे मत सिखाओ कि अपने बच्चों को मैं कैसे संभालूं। मैं तुम्हारे एक बच्चे के साथ रह ही रही हूं जिसे सुधार की बहुत जरूरत है।
बच्चे की स्वीट डिमांड
एक बच्चे को उनकी मां से मार पड़ी, पिता आए और पूछाः 'बेटे क्या हुआ?' बेटे ने कहाः 'मैं आपकी पत्नी के साथ और ज्यादा समझौता नहीं कर सकता, मुझे अपनी चाहिए।
(विपिन बक्शी ने दिल्ली से भेजा)                                                                                                                                            - खुशवंत सिंह