Monday, October 29, 2012

सन् 1962 से हमने सीखा क्या?



 

इस अक्टूबर में सिवाय भारत की लूट और शासन द्वारा देश के भ्रष्टशाही घराने के संरक्षण की आवाजों के और क्या सुनाई देता है?

इतनी अधिक बड़ी राशि के घोटालों का शोर है कि अब इन राशियों को गिनने का ही मन नहीं होता। इतना ही जानना पर्याप्त लगता है कि कारवां लुट गया। एक वे थे जो पचास साल पहले देश की रक्षा के लिए बिना किसी न्यूनतम सामग्री और तैयारी के, चुशूल की हड्डियाँ कंपने वाली ठंड में आखिरी गोली और आखिरी फौजी तक घमासान युद्ध कर दुश्मनों से लड़ते हुए बलिदान हो गए, अपना सब कुछ देश के लिए न्योछावर कर दिया।

वह भी एक अक्टूबर था। उस अक्टूबर को याद करते हुए लता जी ने गाया था−

जब देश में थी दिवाली, वे खेल रहे थे होली।
जब हम बैठे थे घरों में, वे झेल रहे थे गोली।

इस अक्टूबर को देश गुड़गाँव की अपार संपत्तियां, देश के लगभग हर बड़े महानगर में अपार भूमि खरीद, आलीशान जिन्दगी के नए मानक स्थापित करने वाले नेताओं के अहंकारपूर्ण बयानों और उनके मिमियाते से दरबानों की हास्यास्पद रक्षा पंक्तियों को झेल रहा है।

हताशा इतनी है कि अब वोट तक देने की इच्छा नहीं होती।

किसको वोट दें? वे जो बासठ में देश की आयुध निर्माणशालाओं में काफी की मशीनें और लिपिस्टिक बनवा रहे थे और बयान दे रहे थे कि भारत को सेना की जरूरत नहीं क्योंकि हमारा कोई शत्रु नहीं है? 1949 में सरदार पटेल ने नेहरू को पत्र लिखा था कि चीन तिब्बत पर नजर रखे हुए है, हमें सावधान रहना होगा। तिब्बत के साथ हमारा शताब्दियों पुराना व्यापारिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और रणनीतिक सम्बन्ध रहा है। उसको भारत के हित में चीन से बचाना जरूरी है। लेकिन उल्टे नेहरू ने पत्र के जवाब में कहा− चीन ऐसा कभी नहीं करेगा। यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि चीन तिब्बत को हड़प सकता है। भारत से तिब्बत का सम्बन्ध पूरी तरह काटना मोत्सेतुंग का सामरिक उद्देश्य था। तिब्बत का हान− करण यानी चीनीकरण भारत को इस अत्यंत प्राचीन भारतीय प्रभाव और गहन आत्मीयता के क्षेत्र से पूरी तरह अनुपस्थित करने का षड़यंत्र था। ऐसा ही हुआ। तिब्बत सिर्फ विदेश ही नहीं हुआ, तिब्बत चीन हो गया।

पंडित नेहरू ने बाद में स्वयं अपनी मायावादी नीतियों की निरर्थकता स्वीकार की। बासठ के हमले ने उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि और स्वदेशी नेतृत्व को ध्वस्त कर दिया। उस हार ने नेहरू की मृत्यु को भी निकट ला दिया। नेहरू ने बासठ के हमले के बाद राष्ट्र को संबोधन में कहा−हम अपनी ही दुनिया में रह रहे थे और दुश्मन हम पर घात लगाये हुए था।

पचास का दशक भारत के नव निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का था, पर चीन अक्साई चीन पर कब्जा कर रहा था और भारत को पता ही नहीं चला। संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी बार−बार चीन की हलचलों पर आवाज उठाते रहे पर नेहरू सरकार उसे अपनी अन्तर्राष्ट्रीय मित्रता की मृगमरीचिका में उपेक्षित करती रही। सन् 1947 में पाकिस्तान के हमले और सन् 1950 में चीन के अक्साईचीन पर कब्जे ने भारत की एक लाख पचीस हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हमसे अलग कर दी जिसे पुनः वापस लेने की हिम्मत और ताकत कहीं दिखती नहीं।

20 अक्टूबर से सोलह नवम्बर तक चीन ने भारत के दो दूरस्थ सीमान्तों पर दो बार हमला किया। उस समय अरुणाचल प्रदेश नेफा (छम्थ्।) यानी नार्थ−ईस्ट फ्रंटीयर एजेंसी कहा जाता था। चीन का एक साथ हमला लद्दाख और नेफा पर हुआ। उसने भारत के दोनों ओर की सीमान्त चौकियों पर कब्जा कर लिया। लद्दाख में चुशूल के पास त्रिशूल पर्वत उसके पास चला गया। नेफा में तेजपुर तक उसकी सेना आ गयी। आकाशवाणी से दिए अपने संबोधन में नेहरू ने रुंधे गले और भीगी आँखों से असम निवासियों को विदाई दी थी।

हेनरी किस्सिंगर ने हाल ही में पुस्तक लिखी है− चीन पर। उसकी शुरुआत में ही पहले अध्याय का पहला अनुच्छेद भारत पर चीन के हमले से शुरू होता है। माओ के साथ अपनी मुलाकात में किस्सिंगर ने पूछा था− आपने भारत पर हमला क्यों किया और किया भी तो स्वयं युद्धविराम कर अपनी सेना वापस क्यों बुला ली, जबकि भारत प्रतिरोध की स्थिति में था ही नहीं?
माओ ने तनिक विचार कर कहा− चीन भारत को ठिठ्काना चाहता था।

यह पुरानी चीनी रणनीति है। उनकी युद्ध कला का अंश।
प्रतिस्पर्धी को दहशत में रखो। पूरी तरह कुचलने में शक्ति व्यर्थ करने का कोई अर्थ नहीं।

चीन ने उस समय भारत पर हमला किया था, जब क्यूबा में अमरीका उलझा हुआ था और अमरीका तथा सोवियत संघ के बीच मिसाइल युद्ध होने की आशंका प्रबल थी। सोवियत संघ के खुश्चेव चीन के साथ दोस्ती के इच्छुक थे ताकि अमरीका के खिलाफ उसको समर्थन मिले। ऐसी स्थिति में न तो अमरीका से और न ही सोवियत संघ से भारत को किसी तात्कालिक मदद की सम्भावना हो सकती थी। नेहरू केनेडी से सहायता मांगते रहे लेकिन कुछ नहीं मिला। न ही सोवियत संघ ने कुछ किया। एक ही देश था जिसने भारत से मान्यता न मिलने की स्थिति में भी सहायता की और वह था इस्राइल।
भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भीतर से ही चीन के साथ खड़े हो गए थे और सार्वजनिक प्रदर्शन कर चीन की वकालत करते हुए 'भारत द्वारा चीन पर हमले' की निंदा करने लगे थे। परिणामस्वरूप ढाई सौ कम्युनिस्ट नेता, जिनमें नम्बूदरीपाद भी थे नेहरू सरकार द्वारा देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये गए थे। उसी दौर में सेकुलर सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की देशभक्तिपूर्ण सेवा और सैनिकों को दिए समर्थन के अभिनंदनार्थ सन् 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में उनको पूर्ण संघ गणवेश में शामिल होने का निमंत्रण दिया था।

नेहरू उस समय अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के चरम पर थे। मित्रता, पंचशील, करुणा और कविताओं का दौर भारत की विदेश नीति और रक्षा नीति को परिभाषित कर रहा था। 1956 में जब अक्साई चीन पर चीनी कब्जे का मामला उठा तो नेहरू ने कहा− वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता। तब रक्षा राज्य मंत्री थे देहरादून से लोकसभा में चुने गए कांग्रेस नेता महावीर प्रसाद त्यागी। उनसे रहा नहीं गया और उठकर वे बोले− ऐसा मत कहिये, उगता तो आपके सर पर भी कुछ नहीं है। पर वो दौर ही कुछ और था।

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में भयंकर कमजोरियां चीन के हमले ने उजागर कर दीं। भारत के सैनिक साधारण जुराबों, पतले स्वेटर, बेकार जैकटों और पुराने द्वितीय विश्व युद्ध के हथियारों से लड़े।
उनकी बहादुरी और वीरता की अप्रतिम कथाएं चुशूल से तवांग तक बिखरी हुई हैं। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतानसिंह की अहीर पलटन ने चीनियों के खेमे में तबाही मचा दी थी। 4 गढ़वाल राइफल के राइफलमैन जसवंतसिंह रावत ने नेफा में तवांग−सेला सेक्टर में जो कमाल का शौर्य दिखाया उसने न केवल उसे मरणोपरांत महावीर चक्र दिलवाया, बल्कि सेना ने सेला सेक्टर को जसवंतगढ़ का ही नाम दे दिया। सेना की वह बहादुरी और पराक्रम अद्भुत रहा।

लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने भारत के साथ विश्वास भंग किया।

चीन ने सन् 1962 में अपनी और से हमला किया, लद्दाख में तो वह तीन महीने तक बैठा रहा। और फिर एक दिन अपनी ओर से ही युद्ध विराम कर वापस लौट गया। वह चाहता तो नेफा और लद्दाख के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमाये बैठा रह सकता था। भारत के पास उसे खदेड़ने की शक्ति नहीं थी। पर चीन भारत को विश्व में लज्जित कर, तिब्बत में कुछ न करने की चेतावनी और उसे सदैव दहशत में रहने के उद्देश्य से आया था और उसमें सफल होकर लौट गया।

यही मोत्सेतुंग की रणनीति थी।

सन् 1962 में भारत के सैनिक जीते थे पर दिल्ली के राजनेता हारे थे। और फिर हमने अपने सैनिकों के लिए क्या किया? कुछ नहीं सिवाय अपमान और तिरस्कार, सिवाय उनको आई.ए.एस. बाबुओं के भरोसे छोड़ने के, सिवाय उनके साथ धोखा करने के।

पूरे देश में आज एक भी शानदार ऐसा युद्ध स्मारक या विजय स्तम्भ नहीं है जो भारतीय सैनिकों के यश को सार्थकता के साथ अभिव्यक्त करता हो। वन रैंक, वन पेंशन की मांग को लेकर सैनिक संगठन बरसों से लड़ते रहे, जंतर−मंतर पर धरने देते रहे, पर किसी पार्टी ने उनके साथ न्याय नहीं किया। अभी हाल ही में सरकार ने जो घोषणा की है उसको सैनिकों ने अपने साथ छल और विश्वासघात कहा है। यह हमारे घावों पर नमक छिड़कने के समान है, ऐसा सेना के अवकाश प्राप्त जनरल कहते हैं। परमवीर चक्र से लेकर अशोक चक्र और कीर्तिचक्र जीतने वाले बहादुरों को सरकार ढाई हजार रुपये से लेकर पचास हजार रुपये तक की वार्षिक पेंशन देती थी। उसे सबसे पहले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल खंडूरी ने एकमुश्त अनुदान पचास से पचीस लाख रुपये और पचीस हजार रुपये मासिक की पेंशन में बदला। लेकिन आज भी अनेक सरकारों ने उसे अपनाया नहीं है। सैनिक की शिकायतों पर स्थानीय प्रशासन भी ध्यान नहीं देता, उसके लिए राजनीतिक शोर मचने वाले ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

जैसे हमने गंगा को तिरस्कृत कर गन्दा बना दिया, वैसे ही हमने सैनिक की बहादुरी को भी अपमानित कर युवकों के लिए सेना में जाना छठे पांचवें दर्जे की प्राथमिकता में बदल दिया।

सन् 1962 से हमने सीखा क्या?

उस समय चीन का भारत पर हमला था।

अब भारतीयों का ही भारत पर हमला है। लूट और भ्रष्टाचार का हमला।

इस अक्टूबर का यही प्रश्न है।
                                                                                                                                        तरुण विजय

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