Friday, September 28, 2012

शायरी का अच्छा अनुवाद

                                                                                                                                 --  खुशवंत सिंह  
मुझे लगता है कि उर्दू शायरी का अंगरेजी में बेहतरीन अनुवाद विक्टर कीरमैन ने किया है। वह अनुवाद फैज अहमद फैज की शायरी का है। वह दरअसल जुगलबंदी है। यह उस दौर की बात है, जब कीरमैन लाहौर के चीफ्स कॉलेज में अंगरेजी पढ़ा रहे थे। फैज तब एक हिन्दुस्तानी कॉलेज में अंगरेजी पढ़ाते थे। कीरमैन की एक हिन्दुस्तानी बीवी थी। वह खूब हिन्दुस्तानी जानती थी। इन लोगों की आपस में दोस्ती हो गई। सबने मिलकर अनुवाद पर काम किया। उसे पढ़ने में मजा आता है।
मैं यह भी मानता हूं कि उसके बाद उर्दू शायरी का सबसे अच्छा अनुवाद मेरा ही है। मैंने किसी भी हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी या अंगरेज से बेहतर अनुवाद किया है। उर्दू शायरी को शायद मैं उनसे बेहतर समझता हूं। उसे करने का मेरा तरीका बिल्कुल सीधा है। मैं पहले उस शायरी को याद कर लेता हूं। रात में सोने से पहले उसे दोहराता रहता हूं। फिर जो मुझे महसूस होता है, उसे अनुवाद में ढाल देता हूं। हो सकता है कि लोगों को वह थोड़ा भटका हुआ लगे! एक बात जरूर है कि लोगों ने मेरे अनुवादों को बेहद पसंद किया है। मैंने इकबाल का अनुवाद किया है। शिकवा और जवाब ए शिकवा को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने छापा है। अब तक उनके 14 संस्करण छप चुके हैं। और लगातार बिक रहे हैं। कामना प्रसाद के साथ भी जिन किताबों पर मैंने काम किया है, वह खूब सराही जा रही हैं। उनमें अनुवाद तो मेरा ही किया हुआ है। पेंगुइन से आई ‘सेलिब्रेटिंग द बेस्ट ऑफ उर्दू पोएट्री’ को लोगों ने हाथोंहाथ लिया। एक नज्म का आप भी लुत्फ उठाइए-
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई।
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए।।
जैसे सहरों में हौले से चले बाद ए नसीम।
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए।।
मीर तकी मीर
उर्दू शायरी के प्रशंसकों को मीर (1722-1810) से बेहद लगाव है। उनका जन्म आगरा के पास एक गांव में हुआ था। लेकिन उन्होंने ज्यादातर वक्त दिल्ली में ही बिताया। पीने वालों पर मीर ने जो लिखा, उसे खूब याद किया जाता है। जरा देखिए तो सही-
मैं नशे में हूं।
यारो मुझे माफ करो 
मैं नशे में हूं।
अब दो तो जाम खाली ही दो 
मैं नशे में हूं।
मस्ती से बरहमी हैं मेरी गुफ्तगू के बीच
जो चाहो तुम भी मुझको कहो
मैं नशे में हूं।
माजूर हूं, तो पांव मेरा बेतरह पड़े 
तुम मुझसे तो सरगरीबां न हो
मैं नशे में हूं।
भागी नमाज ए जुम्मा तो जाती नहीं हैं कुछ
चलता हूं मैं भी तुम तो रहो 
मैं नशे में हूं।
नाजुक मिजाज आप कयामत हैं मीर जी
जूं शीशा मेरे मुंह न लगो 
मैं नशे में हूं।

पराये घर (पंजाबी कहानी)


मैं जब भी सोता हूं, सोचता हूं, आंखों में औंघाई की कडुआहट मर जाएगी। उठता हूं, कडुआहट वैसी की वैसी ही कायम रहती है। यह कभी भी नहीं मरती? मैं इसके बारे में फिजूल ही सोचने लग गया हूं। पर जब भी कभी फिजूल सोचा है मन की उलझनों को सुलझाया है। जब भी सही सोचा है स्वयं बोर हुआ हूं और स्वयं से दूर चला जाता हूं, जहां से कभी वापस आता। एक राह के आगे एक और रास्ता, एक सड़क के आगे एक और सड़क, एक हद से आगे एक और हद। इन हदों को पार करता, हदों में उलझा है, मैं स्वयं ही अपनी ओर बढ़ता जाता हूं।
मुझसे मेरी परछाईं लम्बी है। यह बढ़ती−घटती परछाइयां किस बात की सूचक हैं? इसका उत्तर किसके पास है? हर एक के पास अपनी घिसी−पिटी बात है।
मुझसे उस लड़की ने आज मिलने के लिए कहा है। मैं उस लड़की को नाम भूल गया हूं। शायद उसका नाम मोनिका है, मंजू है या अंजू! शायद यह तीनों नाम ही उसके हैं। शायद उसका कोई भी नाम नहीं है, क्योंकि लड़की का कोई भी नाम नहीं होता। लड़की सिर्फ लड़की ही होती है, और कुछ नहीं। उसने मुझसे कहीं मिलने के लिए कहा था, कहां? मैं नहीं जानता, पर कहीं के लिए कहा जरूर था। वह लड़की कौन है, मैं उसको जानता हूं, पर उसका नाम नहीं जानता। मैं उससे कई बार मिल चुका हूं। उसने अपना नाम मुझे कई बार बताया है, परन्तु मैं हर बार ही भूल जाता हूं।
मैं उससे कहां मिलूंगा?
उसके घर पर।
उसने अपने घर का पता भी तो नहीं बताया। शायद वह पराये घर में रहती है, इसीलिए उसने घर नहीं बताया। बिचारी! डरती है। पराये घर से हर कोई डरता है। पर वह नहीं जानती कि हम सभी पराये घरों में रहते हैं। मैं भी पराये घर में रह रहा हूं। मैं इस घर से जब भी बाहर झांकता हूं, घर की दीवारें ऊंची हो जाती हैं। हम सभी पराये घरों में कैदी या चोर बनकर बैठे हुए हैं।
मैं अब भी अपने घर में तलखों जैसी महसूस कर रहा हूं। यह तलखी बचपन से ही मेरे साथ रही है। मैंने इसको हर समय, हर जगह महसूस किया है। मैं घर छोड़ कर बाहर शहर की सड़कों पर निकल पड़ता हूं। सड़कों पर लोग साइकिलों, रिक्शों, तांगों और कारों पर भागे जा रहे हैं। ये सब कहां जाएंगे? कहीं भी नहीं? ये अपने घर की तलाश में हैं, पर घर कहां हैं? ये जहां से चले थे, हार थक कर वहीं जा पहुंचेंगे।
कई कारें ऐसी हैं जिनके नंबर तरतीबवार हैं, जैसे 3333 या 4444, मुझे इस तरह की कारें बहुत अच्छी लगती हैं। कितना संतुलन है इन नम्बरों में जिन कारों के नम्बरों में कोई तरतीब नहीं होती, उन्हें देख कर मेरे भीतर बेचैनी पैदा हो जाती है। सुकून और बेचैनी में ही गुजरता हुआ, एक सड़क छोड़ता, दूसरी पकड़ता हूं। ये सारे सड़कों को रेप कर रहे हैं, मैं भी तो। नहीं−नहीं, मैं तो उस लड़की से मिलने जा रहा हूं, जिसका अपना घर नहीं है। मैं उससे कई बार मिल चुका हूं। शायद भरे बाजार में उसका नाम लेकर कोई उसको आवाज दे और मैं जान जाऊं कि यह वही लड़की है, जिससे आज मिलने के लिए मैं घर से निकला हूं।
मैं पूरे शहर में घूमा हूं। उस लड़की को किसी ने भी उसका नाम ले कर आवाज नहीं दी। मैं एक काफी हाउस के आगे खड़ा हो गया हूं। मैंने इस काफी हाउस का नाम पढ़ा है। यह तो वही है जिसमें उसने मुझसे मिलने के लिए कहा था। मैं काफी हाउस के भीतर चला गया हूं। मैं मेजों की ओर देख रहा हूं। हर मेज का अपना नम्बर है। सोलह नम्बर पर एक लड़की बैठी है। हां−हां, सोलह नम्बर मेज पर ही मुझे बैठने के लिए कहा गया था। पर यह लड़की कौन है?
काफी हाउस में सब कुर्सियां खाली हैं पर शोर इतना है कि अपनी आवाज सुनाई नहीं देती।
'इधर आ जाओ।' एक आवाज आई।
मैं आवाज का पीछा करता हूं। आवाज सोलह नम्बर मेज पर जा कर बैठ गयी है, मेरे कदम भी। यहां एक लड़की बैठी है। उसे मैं जानता हूं, पहचानता नहीं। इस मेज पर ही तो वह मुझसे मिलने आने वाली थी।
'मैंने ही तुम्हें आवाज दी है। इस शहर में लोग एक दूसरे के नामों से ही परिचित हैं, उनको पहचानते नहीं हैं। पर मैं तुम्हारा नाम भी नहीं जानती पर पहचान लिया है। तुम भी मुझे सिर्फ नाम से ही जानते होंगे?
मैं सोच रहा था कि मैं तो नाम भी नहीं जानता।
'बैठ जाओ।'
मैं बैठ जाता हूं।
'टू ब्लैक कॉफी।' उसने बैरे से कहा।
मैं मन ही मन सोचता हूं, कितनी बदतमीज लड़की है। मुझसे यह भी नहीं पूछा कि क्या पीना चाहता हूं।
'मैं हमेशा ब्लैक कॉफी पीती हूं। मुझे इससे सुकून मिलता है। पता नहीं क्यों, मुझे काली चीजें बहुत पसंद आती हैं। रियली, मुझे काला सांप उस समय बहुत अच्छा लगता है, जब सिर ऊपर उठाकर फन फैला कर डसता है। पर उफ्!...
स्रोतः खुर्शीद  
अनुवादकः स्व घनश्याम रंजन

सर्वज्ञानी (पंजाबी कहानी)

 
हमने कुछ साहित्य की बातें की, कुछ वर्तमान राजनैतिक स्थिति के विषय में, कुछ कश्मीरी और पंजाबी जीवन के बारे में और फिर हमारी बातें खत्म हो गईं। नूर मुहम्मद ने हुक्का पीना शुरू कर दिया और मुझे हुक्के की गुड़गुड़ाहट की आवाज से नींद आने लगी। मैं भी दिन भर चलते चलते थक गया था और नूर मोहम्मद भी अपने दफ्तर के काम से फुर्सत पाकर आठ बजे ही घर लौटा था।
हम पिछले दो महीने से कश्मीर में थे, पर नूर मोहम्मद से आज पहली बार मिले थे। अचानक मुलाकात हो गई थी और वह जबरदस्ती मुझे एक रात रुकने के लिए अपने घर ले आया था। उसे बड़ी भारी शिकायत थी कि हम इतने दिनों से कश्मीर में रह रहे थे और उसके बारे में खोज नहीं की। वास्तव में मुझे ध्यान ही नहीं था कि नूर मोहम्मद आजकल श्रीनगर में होगा। आज से दस साल पहले केवल दो महीने के लिए बम्बई में हमने एक दफ्तर में एकसाथ काम किया था और उसके बाद उससे आज पहली बार मुलाकात हुई थी।
गुलमर्ग, कुकड़नारा, पहिलगाम, सोनमर्ग, आदि सभी स्थान हम घूम चुके थे, अब तो अंतिम दो दिनों के लिए हम श्रीनगर के एक होटल में रुके हुए थे। सीटे आरक्षित करवा चुके थे। और परसों हमें चले जाना था।
मेरी बीवी नूर मोहम्मद उसकी बीवी से पहली बार मिली थी, मैं तो बम्बई में ही, पहले मिल चुका था। दोनों ही बड़े नेक दिल, मिलनसार और मेहमानवाज थे। दो समय नमाज पढ़ने वाले, रोजा रखने वाले पक्के मुसलमान थे। नूर मोहम्मद की मां, उसकी बहन और बड़ी लड़की भी थी, उन्होंने भीतर गप्पें मारना शुरू कर दी थीं और हम बाहर वाले कमरे में बैठे बातें करते रहे।
नूर मोहम्मद बड़ी प्यारी उर्दू बोलता था और मुझे उसके साथ उर्दू में बातें करने का मजा आ रहा था। उसके साथ बातें करते हुए मुझे अपना एक बुजुर्गवार दोस्त गुलाम जीलानी याद आता रहा, जिस के साथ मैंने बम्बई में कई साल गुजारे थे। इसी तरह वह भी बातें किया करता था, बड़ी दिलचस्प बातें। वह कई बार सारी दुनिया के चक्कर लगा चुका था। जिंदगी का विशाल अनुभव होने के कारण उसके साथ बातों का खजाना कभी भी खत्म नहीं होता था। गुलाम जीलानी की आयु वैसे पचास से ऊपर थी, पर बड़ा जिंदा दिल इंसान था। अगर लड़कियों की बातें आ जायें तो रूस की लड़कियां, जर्मन की लड़कियां, फ्रांसीसी लड़कियां अंग्रेज, अमेरिकी, जापानी, चीनी हर देश की लड़कियों की शक्लें, सूरतें और फैशनों के विषय में चार-चार घंटे तक बड़ी दिलचस्प तकरीर रहता। क्या मजाल कि कोई उकताहट महसूस करे।
पर नूर मोहम्मद की बातें तो झट ही खत्म हो गई थीं और बात करने से अधिक दिलचस्पी वह हुक्के के दम में ले रहा था। दम लगाते लगाते कभी कभी कोई खूबसूरत गठा हुआ वाक्य बोल देता था फिर बड़ी बेसब्री से मेरी बात का इंतजार करने लग जाता था। मैं कुछ देर बाद उल्टी सीधी एक आध बात कहता था। पर मेरे पास करने की कोई बात थी ही नहीं। बम्बई के दिनों की कोई पुरानी बात याद करने की कोशिश करता था जो इस अवसर पर जम सके, पर कम्बख्त दस साल पुरानी बातें याद भी तो नहीं आ रही थीं।
पिछले दस वर्षों में उसकी बात कभी नहीं की थी। इसीलिये वह ताज्जुब कर रही थी कि यह कौन सा इनका छुपा हुआ दोस्त निकल आया था।
नूर मोहम्मद हुक्का पी रहा था, और मैं कभी दीवार पर लटकती तस्वीरें देखने लग जाता, कभी कमरे में सलीके से रखे हुए फर्नीचर की ओर ध्यान ले जाता, कभी रैक पर पड़ी उर्दू किताबों के नाम पढ़ने की कोशिश करता और कभी ऊंघने लग जाता। नूर मोहम्मद ने अभी तक सोने का कोई बंदोबस्त भी नहीं किया लगता था। पता नहीं अब कब सोना नसीब होना था।
मैं सोच रहा था कि केवल मैं ही यहां ऐसी स्थिति में नहीं बैठा हुआ था मेरी बीवी की भी यही हालत होगी। नसीमां तो शायद थोड़ी बहुत उर्दू जानती थी, पर नूर मोहम्मद की मां, बहन और बेटी तो कश्मीरी के सिवा कुछ भी नहीं जानती थीं, नसीमां बेचारी भी भला कितनी बातें कर सकती थी। वह भी बातें करती-करती थक गयी होगी। मां, बहन और बेटी तो बहुत तंग आ चुकी होगी। नसीमा और मेरी बीवी की बातें तो उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रही होंगी। शायद उन तीनों ने आपस में कश्मीरी में ही बातें करनी शुरू कर दीं हों। पर फिर मेरी बीवी तो सोचती होगी कि कहां फंस गई हूं। उसे भी जरूर मेरी तरह ही नींद आ रही होगी। पर वे सारी उसका पीछा कहां छोड़ेंगी। वह तो उनकी महाफिल थी। बातें पता नहीं कब समाप्त करेंगी।
नूर मोहम्मद ने दो-तीन जोर के कश लगाकर हुक्के की नली अलग कर दी और कुछ सोचने लग गए। पर नूर मोहम्मद सोचता-सोचता ऊंघने लग गया और फिर नीचे कालीन पर ही लेट गया। मैं अब तक यही समझ रहा था कि जरा स्थिति बदलकर वह जरूर कोई बात कहेगा। पर उसने कोई बात न की और थोड़ी देर बाद खर्राटे भरने लगा। मुझे यूं लगा जैसे इस हुक्के की तमाखू में जरूर कोई नशे वाली चीज होगी जिसने नूर मोहम्मद को इस तरह कुछ मिनटों में ही दुनिया से बेखबर कर दिया था।
मेरा मन किया कि भीतर वाले कमरे में चला जाऊं, जहां मेरी बीवी चार औरतों में घिरी बैठी थी। पर फिर कुछ सोचकर रुक गया। यह मुसलमान का घर था, और औरतों के कमरे में किसी बाहरी आदमी का जाना बुरा लगता था। फिर मैं जाऊं कहां? इस कमरे में बैठना तो अब भारी हो गया था। नूर मोहम्मद के खर्राटे सारे कमरे में गूंज रहे थे और इनकी आवाजों में भी कुछ क्षण भी यहां रुकना मेरे लिए असंभव था। मैं टहलता हुआ बाहर लॉन में आ गया। वहां बहुत खूबसूरत-खूबसूरत फूल झूम रहे थे। फूलों की सुगंध के बीच चांदनी रात में हल्ली-हल्की ठंडी हवा बड़ी खुशगवार लग रही थी।
हुक्के की गुड़गुड़ाहट तमाखू की सांस घोंटती गंध, और फिर नूर मोहम्मद के उल्लू की आवाज जैसै खर्राटे, मुझे ऐसा लगा जैसे किसी अंधेरी रात में निकल कर मैं इस सुहावने स्थान पर पहुंच गया। फूलों के पास ही एक बेंच पड़ी हुई थी। मैं उस पर बैठ गया। खामोश और शांत वातावरण था। मुझे रह-रह कर अपनी बीवी का ध्यान आ रहा था जो बेचारी चार औरतों के बीच घिरी बैठी होगी। वह उस माहौल में से निकलना चाहती होगी, पर उसका वश नहीं चल रहा होगा, हो सकता है वे चारों औरतें भी बारी-बारी हुक्के का स्वाद ले रही हों। यह तो मुझे याद था कि नसीमा बम्बई में भी हुक्के को कई-कई घंटे नहीं छोड़ती थी। तमाखू की सांस घोटती हवा तो मेरी बीवी कभी भी बरर्दाश्त नहीं कर पा रही होगी। कहीं वह बेहोश न हो जाये। कहीं उसे कुछ हो न जाये। मैं मजबूर था। मैं उस भीतर वाले कमरे में जा ही नहीं सकता था।
मैं बैंच से उठकर टहलने लग गया। मैं जब कुछ कदम ही आगे बढ़ा तो बराण्डे में बच्चों के हंसने की आवाज आई। एक आवाज तो मेरी जानी पहचानी थी। मेरे बच्चे राजू की आवाज। मैंने देखा बराण्डे में राजू और नूर मोहम्मद की साढ़े तीन वर्ष की छोटी बच्ची नजो बातें कर रहे थे। बातें करते-करते वह खिलखिला कर हंस पड़ते थे और हंसने के बाद फिर बातें करने लग जाते थे। मैं हैरान था कि वे कौन सी बातें कर रहे थे। कौन सी हास्य भरपूर बातें थी उनकी। हमारा चौदह साल का राजू पंजाबी में बातें कर रहा था और नजो कश्मीरी में। पर न जाने कैसे वह एक दूसरे की बातें समझ रहे थे। वे एक दूसरे का हुंकारा भरते थे, एक दूसरे की बात बीच में ही काट कर अपनी बात करने लग जाते थे। बातें करते हुए हंसते थे। और फिर लगातार कितनी देर से वे बातें कर रहे थे। जरा भी एक दूसरे से उकताये एक दूसरे को सारी रात सुनाते रहेंगे। सारी रात उनको बातों की कमी नहीं महसूस होगी।
मैं पास जाकर एक पौधे के पीछे खड़े होकर इनकी बातें सुनने लगा। राजू की बातें तो मैं समझ रहा था पर नजो की तोतली कश्मीरी बोली मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रही थी। नजो बोलती जा रही थी और राजू हू-हू ना करता जा रहा था, जैसे वह उसकी बातों का सारा मतलब समझ रहा हो। जैसे वह उसकी बातों में पूरा रस ले रहा हो। जब नजो ने बात समाप्त की तो राजू बोलने लगा। अब नजो उसी दिलचस्पी के साथ हुंकारा भर रही थी, जिस तरह थोड़ी देर पहले राजू भर रहा था। मैं राजू की बातें सुन रहा था, अपने घर की बातें, अपनी सैर की बातें। राजू की बातें अपने खिलौनों की बातें, अपनी मां की बातें, अपने पिता की बातें पर केंद्रीत थीं और नजो उन बातों में रमी हुई थी। बातें सुनती हुई वह राजू की नाचती आंखों में देख रही थी। कभी वह राजू को अपनी नन्हीं बाहों में भर लेती, कभी राजू उसके बालों पर हाथ फेरता। उसका प्यार ले लेता था।
राजू और नजो अपनी बातों में मगन रहे और मैं फूलों की खुशबू लेता हुआ बेंच पर आ बैठा।

                                                                                                                                  -  सुरजीत सिंह सेठी 

शोहरतबाज़ी

बड़ा आदमी मशहूर होता है। और, देखा गया है कि जो मशहूर हो जाता है, वह बड़ा भी हो जाता है। वास्तव में बड़प्पन दो−दिशा मार्ग होता है। एक दिशा से शोहरत आती है, दूसरी दिशा से बड़प्पन। बिना शोहरत के कोई बड़ा नहीं होता, और बिना बड़ा हुए किसी को शोहरत नहीं मिलती। वैसे, यह दो घोड़ों की सवारी है। लेकिन दो घोड़ों का सवार जब एक घोड़े पर से गिरता है तो दूसरे पर भी टिका नहीं रह पाता।
शोहरत एक जुआ है। कुछ लोग इस जुए में माहिर होते हैं। चित तो उनकी होती ही है, पट भी उन्हीं की होती है। शोहरत के सिक्के पर उनका काबू जो होता है। जी हां, शोहरत के लिए सिक्का बहुत जरूरी है। जितने ज्यादा सिक्के, उतनी ज्यादा शोहरत। जो सिक्का उछालता है, उसे शोहरत मिलती है। चित गिरे तो शोहरत, पट पड़े तो शोहरत। बिलकुल फिल्मी सितारों की जिंदगी जैसा मामला है। शादी करे तो शोहरत, तलाक दे तो शोहरत। जितनी शादियां, उतने तलाक, और उतनी शोहरत।
मशहूर आदमी का नाम बार−बार लिया जाता है। शोहरत की असली कुन्जी यही है − नाम का बार−बार लिया जाना। गधे को एक बार गधा बोला जाए तो वह गधा ही रहता है। बार−बार बोला जाए तो मशहूर हो जाता है। जो मशहूर हो जाता है, उसका सम्मान होता है। जी हां, हिदुस्तान में गधों का भी सम्मान होता है। एक गधे के सम्मान में दूसरे गधे भाषण देते हैं− गधे जी का बड़ा नाम है। पिछले दिनों में उनका नाम पचासों बार लिया गया। इससे पता चलता है कि वे कितने बड़े गधे हैं। वैसे एक बात तो है, कोई भी गधा, गधे की तरह मशहूर नहीं होना चाहता। लेकिन जब भी वह मशहूर होने की कोशिश करता है, लोगों को पता चल ही जाता है कि वह गधा है।
शोहरत हर धंधे में हासिल की जा सकती है। कुछ लोग त्याग करने के लिए मशहूर होते हैं। वे तरह−तरह का त्याग कर सकते हैं, लेकिन शोहरत का त्याग कभी नहीं करते। मशहूर संन्यासी संसार तो त्याग देता है, लेकिन आश्रम राजधानी में बनाता है। राजधानी में शोहरत का तंत्र लगातार चलता जो रहता है। 

शोहरत एक बीमारी है। मरीज़ की मर्ज़ी की बीमारी। एक बार जिसे लग जाती है, फिर वह नहीं चाहता कि यह बीमारी कभी उसे छोड़ कर जाए। जब भी उसे लगता है कि शोहरत के कीटाणु उसे छोड़ कर जाने वाले हैं, तो वह कुछ न कुछ ऐसा जरूर करता है कि उसका संक्रमण बना रहे। मान लीजिए, कोई चित्रकार अपने चित्रों के कारण मशहूर है। फिर उसका समय चुक जाता है। अपने चित्रों से उसे शोहरत मिलनी बंद हो जाती है। तब शोहरत पाने के नये तरीके खोजता है। उसके चित्र मशहूर नहीं होते, तो वह मशहूर लोगों के चित्र बनाने शुरू कर देता है। जो घोड़े−गधे बनाता था, वह नेता−अभिनेता बनाने चालू कर देता है। चित्र किसी का भी हो, मतलब तो शोहरत से है। शोहरत के भूखे को हर हाल में शोहरत चाहिए, चाहे वह किसी और की पूंछ पकड़ कर ही क्यों न मिले।
शोहरत की एक आदत पानी से बहुत मिलती है। पानी की तरह वह भी अपना रास्ता खोज ही लेती है। कई रास्ते खोज लेती है। एक संगीतकार बड़ा मशहूर है। सिर्फ अपने संगीत के कारण ही नहीं, अपने बच्चों के कारण भी मशहूर है। ऐसा है कि जो बच्चे उसके हैं, वास्तव में उसके होने नहीं चाहिए थे। बच्चा उसका, घर किसी और का। और, अगर शोहरत के ये बच्चे खुद भी मशहूर हो जाएं तो बाप की शोहरत और भी बढ़ जाती है। क्या है कि आजकल जायज और नाजायज में फर्क खत्म होता जा रहा है। शोहरत के भूखे लोग मानते हैं कि जायज हो या नाजायज, शोहरत तो शोहरत होती है। इसलिए, शोहरत कैसे भी मिले उसमें उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। और, जहां तक परेशानी का सवाल है, तो कुछ लोग दूसरों को परेशान करने के लिए भी मशहूर होते हैं।
शोहरत की बीमारी कोई नयी बीमारी नहीं है। संस्कृत में एक श्लोक है जिसका अर्थ है − 'वह घड़ा फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा, गधे की सवारी करेगा, शोहरत का भूखा कुछ भी करेगा।                                                 -यज्ञ शर्मा         

स्त्री लेखन को हल्के ढंग से लिया जाता है


                                                                                  मधु अरोड़ा 
10 दिसम्बर, 1944 को चेन्नई में जन्मी चित्रा मुद्गल वर्तमान हिन्दी साहित्य में एक सम्मानित नाम हैं। मुंबई से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर चित्रा जी छात्र जीवन से ही ट्रेड यूनियन से जुड़ कर शोषितों के लिये कार्यरत रही हैं। अमृतलाल नागर और प्रेमचन्द से प्रभावित चित्रा जी को लिखने की प्रेरणा मैक्सिम गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास माँ को पढ़ने के बाद मिली। अब तक वे कई लघु कथायें और चार उपन्यास− आवाँ, गिलिगद्दू, एक जमीन अपनी व माधवी कन्नगी लिख चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उनके बाल−कथाओं के पाँच संग्रह भी प्रकाशित हैं। चित्रा मुद्गल को विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें आवाँ के लिये 2000 का इंदु शर्मा कथा सम्मान तथा 2001−02 का उत्तर प्रदेश साहित्य भूषण प्रमुख हैं। आप समाज के पिछड़े वर्गों को जागृत करने के लिये एक सामाजिक संस्था समन्वय भी चला रही हैं। वे स्त्री−शक्ति तथा महिला−मंच से भी जुड़ी हुई हैं। प्रस्तुत है लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोड़ा की बातचीतः−
प्रश्नः आपके लिये स्त्री−विमर्श क्या है?
उत्तरः समाज में स्त्री की जो दोयम दर्जे़ की स्थिति रही है, समाज में जो उसका तिरस्कार रहा है, समाज में उसकी जो उपेक्षा रही है, समाज में जो उसे एक मानवीय दर्जा़ मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला है। वह 'देवी' और 'भोग्यो' के बीच एक पेंडुलम की स्थिति सदियों से जीती रही है। मेरी नज़र में स्त्री−विमर्श का अर्थ है समाज में उस आधी दुनिया के विषय में सोचा जाना जो अपनी साझीदार उपस्थिति से उसे एक संतुलित और मुकम्मल दुनिया का स्वरूप प्रदान करती है लेकिन दुर्भाग्य से उसे अपना सर्वस्व स्वाहा करने के बावजू़द वह संतुलित, मुकम्मल दुनिया नसीब नहीं होती।
प्रश्नः पुरुष समाज स्त्री के साथ आखि़र ऐसा क्यों करता है?
उत्तरः दरअसल, पुरुष यह भूल गया है कि स्त्री के सीने में भी एक अदद दिल है, उसके धड़ के ऊपर के हिस्से में एक अदद दिमाग़ है जो किसी भी मायने में पुरुष के दिमाग़ से कम ऊर्जावान नहीं है। ये विसंगतियां, ये मुद्दे हैं जिनके बारे में स्त्री विमर्श के माध्यम से ग़हराई से समाज का विश्लेषण किया जाना चाहिये कि हम उन्नत भारतीय सभ्यता की बात करते हैं जहां अर्धनारीश्वर के जीवन दर्शन की महत्ता रही है। स्त्री दुर्गा, शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है− इसी शक्ति को पत्नी बनने के बाद बात−बात में चुप रहने के लिये बाध्य किया जाता है, आखि़र क्यों? यौन संबंधों में भी उसे गै़र बराबरी का दर्जा़ दिया जाता है।
प्रश्नः जीवन और समाज में स्त्री की भूमिका अहम है। रचनात्मक भूमिका के बावजू़द स्त्री उपेक्षित क्यों है?
उत्तरः स्त्री की रचनात्मकता की कद्र तो तब होगी जब पुरुष अपने अहम को त्यागेगा। वह अपने पितृसत्तात्मकता अहम् यानी कि 'मैं चलाने वाला हूं। यह घर ही नहीं, यह समाज ही नहीं, यह देश ही नहीं, बल्कि यह राष्ट्र भी।' जहां इस तरह का भाव होगा कि हर चीज़ चलाने का आधार पुरुष के पास है तो वह स्त्री की रचनात्मकता को कहां जगह देगा? मधु, यही तुम साहित्य में देखोगी। हमारे आलोचकों ने स्त्री−लेखन को जनाना लेखन कहकर बहुत बार मज़ाक उड़ाया है। मैं तो कहती हूं कि उनकी कूवत ही नहीं है स्त्री लेखन को पहचानने की। आधी दुनिया अपनी सर्जना के माध्यम से लिख रही है, अपने अंतर्मन की तलछटों को जो अभिव्यक्त कर रही है, वह उस पूरे समाज का ही तो आधा हिस्सा है, वह पहिया है जो अपनी कील से उखड़ चुकने के बाद गाड़ी की गति के साथ घिसट रहा है और उस 'घिसटन' का कोई इलाज़ करने के बजाय उसे निकाल कर हाशिये पर फेंक कर नया पहिया जड़ लेने के अहंकार से भरा है।
प्रश्नः आज का युवा−वर्ग साहित्य से दूर होता जा रहा है, इसके लिये आप किसे दोषी मानती हैं?
उत्तरः इसके लिये हमारी जो शिक्षा नीतियां हैं, मैं उनको दोष देती हूं। साथ ही पारिवारिक वातावरण को भी दोष देती हूं। पहले बच्चों को साहित्यिक वातावरण मिलता था जहां वे माता−पिता को पढ़ते देखते थे कि माता−पिता काम करते हुए भी साहित्य पढ़ते थे, पुस्तकें ख़रीदते भी थे। लेकिन आज माता−पिता ने ख़ुद भी वह छोड़ दिया है। उनकी पूरी तवज्जो जो है उसने बच्चों को कैरियर ओरियन्टेड बना दिया है। पहले मां−बाप सोचते थे कि बच्चों के लिये खेलने को भी समय होना चाहिये। हमारे समय में स्कूलों में लायब्रेरी से पुस्तकें जारी करवाना ज़रूरी था। प्रार्थना के बाद प्रिंसिपल बताते थे कि पाठ्यक्रम में जो लेखक हैं, उन पर पुस्तकें लायब्रेरी में उपलब्ध हैं।
प्रश्नः आपका कहना है कि युवा वर्ग के साहित्य से दूरी के लिए अध्यापक जिम्मेदार हैं?
उत्तरः हां, किसी हद तक। तुम्हीं बताओ, अब जब हिन्दी के अध्यापक ही नहीं पढ़ते तो वे बच्चों को कैसे बतायेंगे कि किस उम्र में क्या पढ़ना चाहिये। आज की नई पीढ़ी को चेतन भगत में रुचि है। उसके लिये वही क्लासिक है। हम यह आरोप नहीं लगा सकते कि नई पीढ़ी में रुचि नहीं है। उनमें रुचि जगाई ही नहीं जाती। दूसरे, पाठ्यक्रम बनाते समय बच्चों का मनोविज्ञान नहीं पकड़ पाते। वे पाठ्यक्रम में ऐसी−ऐसी कहानियां रख देंगे जिनमें बच्चों को कोई दिलचस्पी ही नहीं है। इसने साहित्य का बहुत ही नुक़सान किया है। हमने अपने समय में कालिदास, शाकुंतलम ये सारी चीज़ें पढ़ ली थीं। साहित्य का यह संस्कार जानना बहुत ज़रूरी है।
प्रश्नः आज की कहानी की बात करें तो क्या आपको लगता है कि आजकल की कहानियों में कथात्मकता ख़त्म हो रही है?
उत्तरः नहीं, आजकल की कहानियों में तो नहीं। लेकिन पूरा समकालीन कथा परिदृश्य जो युवा पीढ़ी का है, उसमें वह कथा पर महत्व देने की बजाय शिल्प को ज्य़ादा महत्व दे रहा है। उन्हें लगता है कि शिल्प उनकी कथा की कमज़ोरी को अपने प्रभाव में छिपा लेगा। पर पाठक को कथा पढ़ने के बाद उसमें कहानी ही नहीं मिलती। जो कहानी मर्म को नहीं छूती है, तो वह किसी भी तरह पाठक के मन में परिवर्तन नहीं ला सकती। कहानी जब मर्म को छूती है, उसे लेकर पाठक उद्विग्न होता है, कहानी पाठक के साथ चलती है, रात को सोते समय, सुबह उठते समय, घर के काम को निपटाते समय। तब समझो कि उस कहानी ने पाठक को उद्वेलित किया है। अधिकांश लेखक सोचते हैं कि शिल्प के माध्यम से पाठक को चमत्कृत कर दें और पाठक को सोचने को मौका न दें और पाठक पर बौद्धिक विलास थोप दें। कहानी क्या है? कुछ भी तो नहीं। शैल्पिक कौशल के प्रति अतिरिक्त रुझान के चलते युवा पीढ़ी के कई महत्वपूर्ण रचनाकारों की कथा रचनाओं में सर्वथा नवीन दृष्टि से लैस कथा संकेतों के बावजू़द वह अपने मर्म को छूती नहीं है। लेकिन अल्पना मिश्र, वन्दना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, पंकज सुबीर, प्रियदर्शन, मनोज पांडे, राकेश मिश्र आदि कथा की अन्तर्वस्तु के कलात्मक रचाव में विश्वास रखते नज़र आते हैं और उस रचाव की प्रभावोत्पाकदकता से कथा मर्म वंचित नज़र नहीं आता।
प्रश्नः आज के लेखकों में अपने लेखन को लेकर हड़बड़ी है, ज़ल्दी छपने की छटपटाहट है, रातों−रात शोहरत पाने की अदम्य इच्छा है, इस विषय में आप क्या सोचती हैं?
उत्तरः ये विज्ञापन जगत के लेखक हैं। उस युग में जी रहे हैं। उन्हें मालूम है कि प्रचार−प्रसार उन्हें बहुत ज़ल्दी प्रतिष्ठित कर सकता है। हालांकि वे यह नहीं जानते कि प्रचार−प्रसार के बूते प्रतिष्ठित तो हो जायेंगे लेकिन रचना जब मील का पत्थर नहीं है तो वह अपने पाठक नहीं ढूंढ़ पायेंगी। आप आपस में 'मेरी पीठ तू ख़ुजला, तेरी पीठ मैं खुजलाउं' करेंगे। यह एक असहिष्णुता है। यह लेखकों का जो युवा वर्ग है वह तात्कालिकता में विश्वास रखता है, पर यह सच है कि रचना अपने पाठक ढूंढ़ती है।
प्रश्नः दिल्ली की साहित्यिक राजनीति से आपका व्यक्तित्व कभी प्रभावित हुआ है?
उत्तरः नहीं। मेरा व्यक्तित्व इसलिये प्रभावित नहीं होता क्यों कि मैं इस राजनीति से दूर रहती हूं। मुझे जहां बुलाया जाता है, वहां उस कार्यक्रम में जाती हूं। मैं चुनती हूं कि मुझे किस कार्यक्रम में जाना चाहिये। मैं सोचती हूं कि अमुक कार्यक्रम में जाकर मुझे क्या हासिल होगा? अग़र मैं वृद्धाश्रम न जाऊं तो मेरे एक दिन वहां न जाने से क्या फर्क़ पड़ेगा और मैं यदि इस संगोष्ठी में जाऊं तो वही लोग और वही बातें। क्या करना है असग़र वजाहत को सुनकर, जो कहते हैं कि हिन्दी के लिये रोमन लिपि ठीक है।
प्रश्नः आप जब लेखन करती हैं तो सृजन से पूर्व, सृजन के समय और सृजन के बाद आपकी मनःस्थिति क्या होती है?
उत्तरः जिस चीज़ को लिखने के लिये मेरी उद्विग्नता उसको लिखने से पहले होती है और अग़र अपने मनमाफि़क लिख लिया तब तो ठीक है। पर मैं जब लिखना शुरू करती हूं और लगता है कि वह मेरे हाथ नहीं आ रहा है जो सोचा है तो मैं उसे लिखने का इरादा छोड़ दूंगी। लेकिन जिस वक्त जो सोचा है, उसे अग़र कागज़ पर उतार लिया है तो मुझे बहुत संतुष्टि होती है कि अब मैंने ख़ाका तो उतार लिया है। मैं एक बार में ही नहीं लिख सकती। एक कहानी को कम से कम तीन बार देखना पड़ता है। इसलिये पैंतालिस साल के लेखन में कुल जमा सत्तर कहानियां लिखी होंगी। मधु, दरअसल, जो जीवन−मूल्य, जो संघर्ष थे और अब जो नई−नई चीजें आईं तो नई−नई अड़चनें आईं। पहले की कुछ अड़चनें ख़त्म हो रही हैं। तो जो यह संक्रमण काल चल रहा है, जो बाज़ारवाद और वैश्विकतावाद से आया है, इससे जूझने के लिये लेखकों को सन्नरद्ध होना चाहिये। लेकिन ये लोग प्रपंच करते घूम रहे हैं कि यह मेरा ख़ेमा, तेरा ख़ेमा वो, तेरा ख़ेमा वो, तेरा ख़ेमा वो। ये विषमताएं लेखक क्या दूर करेगा जब वह ख़ुद ही ऐसा करता है।
प्रश्नः आप साहित्य, दूरदर्शन आदि में बड़े प्रतिष्ठित पदों पर आसीन रही हैं, इनसे जुड़े खट्टे−मीठे अनुभव अपने पाठकों से शेयर करना चाहेंगी?
उत्तरः मेरे कड़वे−मीठे अनुभव मेरे संघर्ष का हिस्सा बनते हैं। मुझे लगता है कि जब कभी ये कड़वे−मीठे अनुभव लिखूंगी तो वे मेरे पाठकों का हिस्सा बन सकते हैं। पाठक तो मेरे लिये वह अदालत है जिसमें मेरे अनुभवों का जो पिटारा है वह रचना−सर्जना के माध्यकम से पहुंचता रहता है। मैं निश्चित रूप से अपने अनुभव लिखूंगी। मैं कभी हार नहीं मानती हूं। मैं अपनी बात रख देती हूं, आप मुझे अपनी बात समझा दीजिये।

टाइपिंग का अभ्यास भी कराता है इंटरनेट

                                                                           बालेन्दु शर्मा दाधीच  
टाइपराइटर कब के गुम हो गए लेकिन टाइपिंग की जरूरत आज भी है। अगर आपने टाइपिंग का अभ्यास किया है कंप्यूटर पर काम करना काफी सुविधाजनक हो जाता है। जो लोग दो उंगलियों का इस्तेमाल करते हुए या फिर कीबोर्ड को गौर से देख-देखकर टाइप करते हैं, वे तेजी से काम निपटाने की सोच भी नहीं सकते। हालाँकि टाइपिंग सीखना इतना मुश्किल नहीं है। यहाँ तक कि कुछ इंटरनेट वेबसाइटें भी आपको टाइपिंग की ट्रेनिंग देती हैं।
typingweb.com (टाइपिंगवेब.कॉम): यहाँ हर किस्म के यूज़र्स के लिए सूटेबल टाइपिंग लेसन्स मौजूद हैं और टीचर्स के लिए खास किस्म के टूल भी। पहली बार टाइपिंग करने जा रहे लोगों से लेकर पेशेवरों तक को यहाँ टाइपिंग सीखने में मजा आएगा। आपकी टाइपिंग कितनी शुद्ध है और स्पीड कितनी बढ़ रही है इस पर निगाह रखना बहुत आसान है। सारी प्रोसेस को दिलचस्प बनाने के लिए टाइपिंग के कुछ गेम भी मौजूद हैं और कोर्स पूरा करने पर बाकायदा सर्टीफिकेट भी जारी किया जाता है। वह भी फ्री।
freetypinggame.net (फ्रीटाइपिंगगेम.नेट): यहाँ बड़े धीरज के साथ टाइपिंग सिखाई जाती है। एक बार में सिर्फ दो कुंजियाँ लेकर, जैसे d और k। उनका अभ्यास हो जाने पर दूसरी दो कुंजियाँ (कीबोर्ड की’ज)। अक्षरों की शुरूआत से पहले बाकायदा कीबोर्ड पर हाथ जमाने की प्रैक्टिस कराई जाती है ताकि आप टच-टाइपिंग के एक्सपर्ट बन सकें। इसके बाद एक-एक कर अक्षरों के लेसन सामने आते हैं। ऑनलाइन कीबोर्ड की मदद लेते हुए टाइपिंग में मास्टरी करना आसान है। अभ्यास के दौरान आप टारगेट स्पीड चुन सकते हैं जो पाँच से 60 कैरेक्टर प्रति मिनट तक हो सकती है।
bbc.co.uk/schools/typing (बीबीसी स्कूल्स टाइपिंग): बीबीसी ने स्कूली बच्चों को खेल-खेल में टाइपिंग का अभ्यास कराने के लिए यह दिलचस्प वेबसाइट बनाई है। यहाँ मुश्किल के हिसाब से टाइपिंग अभ्यास के चार अलग-अलग लेवल हैं। साइट का दावा है कि इसकी 12 स्टेज पार करने तक आप टाइपिंग में मास्टरी हासिल कर लेंगे। लेसन्स में ऑडियो भी है और बड़ी दिलचस्प कमेंटरी भी।
Goodtyping.com (गुडटाइपिंग.कॉम): यहाँ पर यूज़र को अंग्रेजी ही नहीं बल्कि बीस अलग-अलग भाषाओं (हिंदी नहीं) में टाइपिंग सिखाने की व्यवस्था है, जैसे फ्रेंच, जर्मन, इटेलियन, पुर्तगाली आदि। फोकस इस बात पर है कि आप कीबोर्ड पर अपनी उंगलियाँ सही ढंग से रखना सीखें ताकि टाइपिंग के समय सबको इस्तेमाल कर सकें। स्टेप बाई स्टेप टाइपिंग के लिए 27 गाइडेड लेसन मौजूद हैं। न कुछ डाउनलोड करने की जरूरत है और न ही कोई फीस देने की। हाँ, फ्री रजिस्ट्रेशन करना जरूरी है।
hindityping.in (हिंदीटाइपिंग.इन): हिंदी में टाइपिंग सीखने के इच्छुक इस वेबसाइट को आजमा सकते हैं, हालाँकि यहाँ पर यूनिकोड नहीं बल्कि लीगेसी डेव लिस फॉन्ट (Dev Lys) का इस्तेमाल किया जाता है। कीबोर्ड भी रेमिंगटन इस्तेमाल होता है। अगर आप कृति देव, डेव लिस, अजय, अमन, आगरा आदि फॉन्ट्स में हिंदी में काम करना चाहते हैं तो अभ्यास के लिए इसकी मदद ले सकते हैं। एक और वेबसाइट indiatyping.com पर भी हिंदी में टाइपिंग सिखाई जाती है लेकिन वह भी इन्हीं फॉन्ट्स के हिसाब से चलती है।

Sunday, September 16, 2012

नई हिंदी गढ़ रही है सोशल नेटवर्किंग


नई हिंदी गढ़ रही है सोशल नेटवर्किंग


 



 
तकनीकी विश्व में हिंदी की बहार दिखाई देती है- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में। इनमें से पहला माध्यम चढ़ाव पर तो दूसरे में ठहराव है। जिस अंदाज में हिंदी विश्व ने फेसबुक को अपनाया है, वह अद्भुत है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को भूल जाइए, लखनऊ, पटना और जयपुर जैसी राजधानियों को भी भूल जाइए, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों तक के युवा, बुजुर्ग, बच्चे फेसबुक पर आ जमे हैं और खूब सारी बातें कर रहे हैं- हिंदी में। सोशल नेटवर्कों की हिंदी भी अपने आप में विलक्षण है- हिंदी, अंग्रेजी, देशज, तकनीकी, चित्रात्मक और अनौचपारिक शब्दावली से भरी हुई। लेकिन है बहुत दिलचस्प। आप चाहें तो इस हिंदी का छिद्रान्वेषण कर उसकी भाषायी सीमाओं, त्रुटियों और विसंगतियों पर थीसिस लिख सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी के प्रसार में दिलचस्पी रखते हैं तो यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह है तो हिंदी ही। शायद हिंदी की एक अलग खुशबू। कौन जाने आगे चलकर सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग से उपजी शब्दावली, वाक्य-विन्यास और भाषिक प्रवृत्तियाँ मुख्यधारा की हिंदी पर भी कोई न कोई असर डालें।


आप चाहें तो सोशल नेटवर्किंग की हिंदी का छिद्रान्वेषण कर उसकी भाषायी सीमाओं, त्रुटियों और विसंगतियों पर थीसिस लिख सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी के प्रसार में दिलचस्पी रखते हैं तो यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह है तो हिंदी ही।


पिछले तीन-चार साल में यदि तकनीकी दुनिया में हिंदी से जुड़ी कोई क्रांति दिखाई देती है तो वह है सोशल नेटवर्किंग की क्रांति। चूँकि संदेशों का आदान-प्रदान नेटवर्किंग की मूलभूत अनिवार्यता और पहचान है, इसलिए वह एक से दो, दो से चार लोगों को आपस में संपर्क करने के लिए प्रेरित कर रही है। और संदेश जब तक अपनी भाषा में न हों, अपने आसपास के परिवेश से जुड़े हुए न हों तब तक न तो बात कहने वाले को तसल्ली देते हैं और न ही उसे सुनने वाले को। अंग्रेजी में संदेश भेजकर देखिए। अगर आपकी मातृभाषा हिंदी है तो आपको एक कसक सी महसूस होगी। लगेगा कि अभिव्यक्ति में वह बात नहीं आई। लेकिन उसी को हिंदी, बंगला, गुजराती या तमिल में भेजकर देखिए तो सुकून महसूस होगा। अपनी मातृभाषा माँ के समान है, जिसके साथ कोई संकोच, कोई परदा, कोई औपचारिकता और कोई आडम्बर करने की जरूरत नहीं है। जैसा सोचते हैं, वैसा लिख सकते हैं। तकनीकी दुनिया में हिंदी जैसी भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए फेसबुक एक बहुत अच्छा उपकरण सिद्ध हो सकता है।
हजारों लोग जो हिंदी में टाइपिंग करना नहीं जानते थे, वे सिर्फ इसलिए टाइपिंग के टूल्स की तलाश में लगे हैं ताकि वे हिंदी में संदेश भेज सकें। दूसरे हजारों लोग ऐसा सफलतापूर्वक कर भी चुके हैं। बहुतों ने खास तौर पर इसीलिए हिंदी में टाइपिंग सीखी है। उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियाँ हिंदी की समन्वित शक्ति में इजाफ़ा कर रही हैं।
क्या सोशल नेटवर्किंग हमारी भाषा को विकृत भी कर रही है? हाँ, यकीनन। क्योंकि जिस अंदाज में वह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है, उसमें प्रयुक्त भाषा का बहाव दैनिक जीवन तक भी होना स्वाभाविक है। बहुत से लोग धीरे-धीरे उन शब्दों को अपना लेंगे जिनकी रचना फेसबुक की उर्वर भूमि पर हुआ है। किंतु यह भाषा पर है कि वह किस समझदारी के साथ अपने आपको विकृतियों से मुक्त रखते हुए नए शब्दों को अपनाती है। आवश्यक नहीं कि ये शब्द परिनिष्ठित हिंदी का हिस्सा बनें लेकिन हमारी समग्र शब्दावली का हिस्सा वे जरूर बन सकते हैं क्योंकि भाषा वही आगे बढ़ती है जो तरल और बहती हुई है, जो नए तत्वों से वितृष्णा नहीं रखती बल्कि ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देहि उड़ाय’ वाली प्रवृत्ति से युक्त है।
अभिव्यक्ति की बेचैनी
हिंदी में अभिव्यक्ति की उत्कंठा सिर्फ यहीं नहीं है। जहाँ कहीं भी संचार की आवश्यकता है, वहाँ-वहाँ यह उत्कंठा, यह आकांक्षा, यह बेचैनी दिखाई देती है। इंटरनेट के संदर्भ में मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि कन्टेन्ट या विषय वस्तु ने हिंदी का जितना प्रसार किया है, उससे कहीं अधिक उसका प्रसार संचार के तकनीकी साधनों ने किया है। आज टैबलेट्स और स्मार्टफोन्स के युग में भी हम उसी परिघटना को अनुभव कर रहे हैं जो कुछ साल से सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग के संदर्भ में देखते आए थे।
भारत में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी हुई है, शिक्षा का भी प्रसार हुआ है और तकनीकी चीज़ों के प्रति संदेह का भाव कम हुआ है। ये चीजें आर्थिक दृष्टि से भी लोगों की पहुँच में आ रही हैं। उसी के साथ-साथ संवाद की जरूरत भी पढ़ रही है और वहाँ अपनी भाषा की जरूरत पड़ ही जाती है। लोग लंबे समय तक रोमन में एसएमएस मोबाइल संदेश भेजते रहे सिर्फ इसलिए कि उनके मोबाइल फोन में हिंदी टाइप करने का कोई जरिया नहीं था और बिना हिंदी में अपनी बात कहे संतुष्टि नहीं होती। इस बीच मोबाइल फोन, खासकर स्मार्टफोन की क्षमता बढ़ी है तो उनमें एक से अधिक भाषाओं की सुविधाएँ समाहित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया है। कोई तकनीकी रुकावट नहीं है। अगर रुकावट है तो कंपनियों के स्तर पर, जो अलग-अलग उत्पाद को अलग-अलग वर्ग को ध्यान में रखकर बाजार में उतारती हैं। उन्हें लगता है कि किसी खास मोबाइल फोन में हिंदी होनी जरूरी है क्योंकि यह आम लोगों तक पहुँचने वाला है। दूसरी ओर कुछ महँगे, आधुनिक और स्मार्ट किस्म के फोन्स में हिंदी टेक्स्ट इनपुट की अनिवार्यता उन्हें महसूस नहीं होती क्योंकि उन्हें लगता है कि जो वर्ग इन्हें खरीदने वाला है वह तो पहले ही अंग्रेजीदाँ बन चुका है, और उसे हिंदी में संदेश भेजने की क्या जरूरत पड़ेगी? जैसे-जैसे हम खाँटी हिंदी प्रेमियों की आर्थिक क्षमता बढ़ रही है, उनकी यह धारणा टूटेगी और एक-एक कर सब हिंदी की शरण में आ जाएंगे। हिंदी के पास संख्या बल और बाजार जो है।
ब्लॉगिंग पर दबाव
ब्लॉगिंग पर इन दिनों नए पाठकों तो आकर्षित करने, अपने कन्टेन्ट की ताजगी बनाए रखने और मोटीवेशन बनाए रखने का दबाव है। सोशल नेटवर्किंग के लोकप्रिय होने का प्रभाव ब्लॉगिंग पर पड़ा है और उसमें जिस तेजी के साथ विस्तार आ रहा था, वह गति मंद पड़ी है। कारण, सोशल नेटवर्किंग अपने दोस्तों के साथ जुड़े रहते हुए अपनी बात कहने का मौका देता है और अपेक्षाकृत अधिक सुलभ तथा आसान है। वहाँ आप जो टिप्पणी कर रहे हैं, वह छोटी सी, अनौपचारिक भी हो सकती है और दूसरों की टिप्पणियाँ भी इस्तेमाल और शेयर की जा सकती हैं इसलिए अच्छा लिखने का दबाव नहीं है। इस वजह से हर कोई सोशल नेटवर्किंग में कुछ न कुछ कह देता है। ब्लॉगिंग के साथ ऐसा नहीं है। वह अधिक गंभीर और अधिक रचनात्मक माध्यम है। दूसरे, जो लोग सोशल नेटवर्किंग पर सक्रिय हैं, उनके लिए फिर ब्लॉगिंग पर भी सक्रिय बने रहना ज्यादा समयसाध्य हो जाता है जिससे ब्लॉगिंग की विकास दर के साथ-साथ ब्लॉगों के अपडेशन की स्थिति प्रभावित हो रही है।
हालाँकि कुछ हद तक इसका अप्रत्यक्ष लाभ हिंदी से ही जुड़े कुछ दूसरे क्षेत्रों को हुआ है, जैसे ई-मैगजीन्स या वेबसाइटें को। ब्लॉगिंग की दुनिया में मजबूत जगह बना चुके चेहरों को अब यह माध्यम थोड़ा छोटा लगने लगा है और वे अपनी वेब-मौजूदगी को अपग्रेड करने में जुटे हैं। नतीजा है, हिंदी में नई-नई, ताजगी से भरी वेबसाइटों का आगमन। इनमें मोहल्ला, भड़ास4मीडिया, विस्फोट, तरकश, नुक्कड़, मीडिया खबर, देशकाल, जनादेश, डेटलाइन इंडिया, परिकल्पना, हस्तक्षेप, प्रवक्ता, हिंदी होमपेज, सामयिकी, हिंद युग्म, मीडिया दरबार, चौराहा, मीडिया सरकार, चौराहा, फुरसतिया, सृजनगाथा, युगजमाना, जनता जनार्दन, अर्थ काम, साहित्य कुंज, साहित्य शिल्पी, तकनीक.ऑर्ग वगैरह शामिल हैं। देखते ही देखते ब्लॉगिंग समुदाय की बदौलत हिंदी में विविधताओं से भरी सामग्री की धारा बह निकली है जो बहुत सजीव, जीवंत और हिंदी की विशुद्ध खुशबू लिए हुए है। हिंदी जगत में जिस किस्म के विवाद, धमाल, उठापटक, हंगामे और बहसें यहाँ पर भी हैं और शायद इसीलिए इन सबको पढ़ना खाँटी हिंदी पाठक के लिए अधिक रुचिकर भी है। किसी घटना को कई कोणों से देखना पढ़ना और समझना चाहते हैं तो हिंदी के युवाओं के उल्लास और रचनाकर्म से भरी इन वेबसाइटों पर एक नज़र जरूर डालिए. -  बालेन्दु शर्मा दाधीच