मैं जब भी सोता हूं, सोचता हूं, आंखों में औंघाई की कडुआहट मर जाएगी। उठता हूं, कडुआहट वैसी की वैसी ही कायम रहती है। यह कभी भी नहीं मरती? मैं इसके बारे में फिजूल ही सोचने लग गया हूं। पर जब भी कभी फिजूल सोचा है मन की उलझनों को सुलझाया है। जब भी सही सोचा है स्वयं बोर हुआ हूं और स्वयं से दूर चला जाता हूं, जहां से कभी वापस आता। एक राह के आगे एक और रास्ता, एक सड़क के आगे एक और सड़क, एक हद से आगे एक और हद। इन हदों को पार करता, हदों में उलझा है, मैं स्वयं ही अपनी ओर बढ़ता जाता हूं।
मुझसे मेरी परछाईं लम्बी है। यह बढ़ती−घटती परछाइयां किस बात की सूचक हैं? इसका उत्तर किसके पास है? हर एक के पास अपनी घिसी−पिटी बात है।
मुझसे उस लड़की ने आज मिलने के लिए कहा है। मैं उस लड़की को नाम भूल गया हूं। शायद उसका नाम मोनिका है, मंजू है या अंजू! शायद यह तीनों नाम ही उसके हैं। शायद उसका कोई भी नाम नहीं है, क्योंकि लड़की का कोई भी नाम नहीं होता। लड़की सिर्फ लड़की ही होती है, और कुछ नहीं। उसने मुझसे कहीं मिलने के लिए कहा था, कहां? मैं नहीं जानता, पर कहीं के लिए कहा जरूर था। वह लड़की कौन है, मैं उसको जानता हूं, पर उसका नाम नहीं जानता। मैं उससे कई बार मिल चुका हूं। उसने अपना नाम मुझे कई बार बताया है, परन्तु मैं हर बार ही भूल जाता हूं।
मैं उससे कहां मिलूंगा?
उसके घर पर।
उसने अपने घर का पता भी तो नहीं बताया। शायद वह पराये घर में रहती है, इसीलिए उसने घर नहीं बताया। बिचारी! डरती है। पराये घर से हर कोई डरता है। पर वह नहीं जानती कि हम सभी पराये घरों में रहते हैं। मैं भी पराये घर में रह रहा हूं। मैं इस घर से जब भी बाहर झांकता हूं, घर की दीवारें ऊंची हो जाती हैं। हम सभी पराये घरों में कैदी या चोर बनकर बैठे हुए हैं।
मैं अब भी अपने घर में तलखों जैसी महसूस कर रहा हूं। यह तलखी बचपन से ही मेरे साथ रही है। मैंने इसको हर समय, हर जगह महसूस किया है। मैं घर छोड़ कर बाहर शहर की सड़कों पर निकल पड़ता हूं। सड़कों पर लोग साइकिलों, रिक्शों, तांगों और कारों पर भागे जा रहे हैं। ये सब कहां जाएंगे? कहीं भी नहीं? ये अपने घर की तलाश में हैं, पर घर कहां हैं? ये जहां से चले थे, हार थक कर वहीं जा पहुंचेंगे।
कई कारें ऐसी हैं जिनके नंबर तरतीबवार हैं, जैसे 3333 या 4444, मुझे इस तरह की कारें बहुत अच्छी लगती हैं। कितना संतुलन है इन नम्बरों में जिन कारों के नम्बरों में कोई तरतीब नहीं होती, उन्हें देख कर मेरे भीतर बेचैनी पैदा हो जाती है। सुकून और बेचैनी में ही गुजरता हुआ, एक सड़क छोड़ता, दूसरी पकड़ता हूं। ये सारे सड़कों को रेप कर रहे हैं, मैं भी तो। नहीं−नहीं, मैं तो उस लड़की से मिलने जा रहा हूं, जिसका अपना घर नहीं है। मैं उससे कई बार मिल चुका हूं। शायद भरे बाजार में उसका नाम लेकर कोई उसको आवाज दे और मैं जान जाऊं कि यह वही लड़की है, जिससे आज मिलने के लिए मैं घर से निकला हूं।
मैं पूरे शहर में घूमा हूं। उस लड़की को किसी ने भी उसका नाम ले कर आवाज नहीं दी। मैं एक काफी हाउस के आगे खड़ा हो गया हूं। मैंने इस काफी हाउस का नाम पढ़ा है। यह तो वही है जिसमें उसने मुझसे मिलने के लिए कहा था। मैं काफी हाउस के भीतर चला गया हूं। मैं मेजों की ओर देख रहा हूं। हर मेज का अपना नम्बर है। सोलह नम्बर पर एक लड़की बैठी है। हां−हां, सोलह नम्बर मेज पर ही मुझे बैठने के लिए कहा गया था। पर यह लड़की कौन है?
काफी हाउस में सब कुर्सियां खाली हैं पर शोर इतना है कि अपनी आवाज सुनाई नहीं देती।
'इधर आ जाओ।' एक आवाज आई।
मैं आवाज का पीछा करता हूं। आवाज सोलह नम्बर मेज पर जा कर बैठ गयी है, मेरे कदम भी। यहां एक लड़की बैठी है। उसे मैं जानता हूं, पहचानता नहीं। इस मेज पर ही तो वह मुझसे मिलने आने वाली थी।
'मैंने ही तुम्हें आवाज दी है। इस शहर में लोग एक दूसरे के नामों से ही परिचित हैं, उनको पहचानते नहीं हैं। पर मैं तुम्हारा नाम भी नहीं जानती पर पहचान लिया है। तुम भी मुझे सिर्फ नाम से ही जानते होंगे?
मैं सोच रहा था कि मैं तो नाम भी नहीं जानता।
'बैठ जाओ।'
मैं बैठ जाता हूं।
'टू ब्लैक कॉफी।' उसने बैरे से कहा।
मैं मन ही मन सोचता हूं, कितनी बदतमीज लड़की है। मुझसे यह भी नहीं पूछा कि क्या पीना चाहता हूं।
'मैं हमेशा ब्लैक कॉफी पीती हूं। मुझे इससे सुकून मिलता है। पता नहीं क्यों, मुझे काली चीजें बहुत पसंद आती हैं। रियली, मुझे काला सांप उस समय बहुत अच्छा लगता है, जब सिर ऊपर उठाकर फन फैला कर डसता है। पर उफ्!...
स्रोतः खुर्शीद
अनुवादकः स्व घनश्याम रंजन
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