Friday, September 28, 2012

शोहरतबाज़ी

बड़ा आदमी मशहूर होता है। और, देखा गया है कि जो मशहूर हो जाता है, वह बड़ा भी हो जाता है। वास्तव में बड़प्पन दो−दिशा मार्ग होता है। एक दिशा से शोहरत आती है, दूसरी दिशा से बड़प्पन। बिना शोहरत के कोई बड़ा नहीं होता, और बिना बड़ा हुए किसी को शोहरत नहीं मिलती। वैसे, यह दो घोड़ों की सवारी है। लेकिन दो घोड़ों का सवार जब एक घोड़े पर से गिरता है तो दूसरे पर भी टिका नहीं रह पाता।
शोहरत एक जुआ है। कुछ लोग इस जुए में माहिर होते हैं। चित तो उनकी होती ही है, पट भी उन्हीं की होती है। शोहरत के सिक्के पर उनका काबू जो होता है। जी हां, शोहरत के लिए सिक्का बहुत जरूरी है। जितने ज्यादा सिक्के, उतनी ज्यादा शोहरत। जो सिक्का उछालता है, उसे शोहरत मिलती है। चित गिरे तो शोहरत, पट पड़े तो शोहरत। बिलकुल फिल्मी सितारों की जिंदगी जैसा मामला है। शादी करे तो शोहरत, तलाक दे तो शोहरत। जितनी शादियां, उतने तलाक, और उतनी शोहरत।
मशहूर आदमी का नाम बार−बार लिया जाता है। शोहरत की असली कुन्जी यही है − नाम का बार−बार लिया जाना। गधे को एक बार गधा बोला जाए तो वह गधा ही रहता है। बार−बार बोला जाए तो मशहूर हो जाता है। जो मशहूर हो जाता है, उसका सम्मान होता है। जी हां, हिदुस्तान में गधों का भी सम्मान होता है। एक गधे के सम्मान में दूसरे गधे भाषण देते हैं− गधे जी का बड़ा नाम है। पिछले दिनों में उनका नाम पचासों बार लिया गया। इससे पता चलता है कि वे कितने बड़े गधे हैं। वैसे एक बात तो है, कोई भी गधा, गधे की तरह मशहूर नहीं होना चाहता। लेकिन जब भी वह मशहूर होने की कोशिश करता है, लोगों को पता चल ही जाता है कि वह गधा है।
शोहरत हर धंधे में हासिल की जा सकती है। कुछ लोग त्याग करने के लिए मशहूर होते हैं। वे तरह−तरह का त्याग कर सकते हैं, लेकिन शोहरत का त्याग कभी नहीं करते। मशहूर संन्यासी संसार तो त्याग देता है, लेकिन आश्रम राजधानी में बनाता है। राजधानी में शोहरत का तंत्र लगातार चलता जो रहता है। 

शोहरत एक बीमारी है। मरीज़ की मर्ज़ी की बीमारी। एक बार जिसे लग जाती है, फिर वह नहीं चाहता कि यह बीमारी कभी उसे छोड़ कर जाए। जब भी उसे लगता है कि शोहरत के कीटाणु उसे छोड़ कर जाने वाले हैं, तो वह कुछ न कुछ ऐसा जरूर करता है कि उसका संक्रमण बना रहे। मान लीजिए, कोई चित्रकार अपने चित्रों के कारण मशहूर है। फिर उसका समय चुक जाता है। अपने चित्रों से उसे शोहरत मिलनी बंद हो जाती है। तब शोहरत पाने के नये तरीके खोजता है। उसके चित्र मशहूर नहीं होते, तो वह मशहूर लोगों के चित्र बनाने शुरू कर देता है। जो घोड़े−गधे बनाता था, वह नेता−अभिनेता बनाने चालू कर देता है। चित्र किसी का भी हो, मतलब तो शोहरत से है। शोहरत के भूखे को हर हाल में शोहरत चाहिए, चाहे वह किसी और की पूंछ पकड़ कर ही क्यों न मिले।
शोहरत की एक आदत पानी से बहुत मिलती है। पानी की तरह वह भी अपना रास्ता खोज ही लेती है। कई रास्ते खोज लेती है। एक संगीतकार बड़ा मशहूर है। सिर्फ अपने संगीत के कारण ही नहीं, अपने बच्चों के कारण भी मशहूर है। ऐसा है कि जो बच्चे उसके हैं, वास्तव में उसके होने नहीं चाहिए थे। बच्चा उसका, घर किसी और का। और, अगर शोहरत के ये बच्चे खुद भी मशहूर हो जाएं तो बाप की शोहरत और भी बढ़ जाती है। क्या है कि आजकल जायज और नाजायज में फर्क खत्म होता जा रहा है। शोहरत के भूखे लोग मानते हैं कि जायज हो या नाजायज, शोहरत तो शोहरत होती है। इसलिए, शोहरत कैसे भी मिले उसमें उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। और, जहां तक परेशानी का सवाल है, तो कुछ लोग दूसरों को परेशान करने के लिए भी मशहूर होते हैं।
शोहरत की बीमारी कोई नयी बीमारी नहीं है। संस्कृत में एक श्लोक है जिसका अर्थ है − 'वह घड़ा फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा, गधे की सवारी करेगा, शोहरत का भूखा कुछ भी करेगा।                                                 -यज्ञ शर्मा         

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