Sunday, September 16, 2012

नई हिंदी गढ़ रही है सोशल नेटवर्किंग


नई हिंदी गढ़ रही है सोशल नेटवर्किंग


 



 
तकनीकी विश्व में हिंदी की बहार दिखाई देती है- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में। इनमें से पहला माध्यम चढ़ाव पर तो दूसरे में ठहराव है। जिस अंदाज में हिंदी विश्व ने फेसबुक को अपनाया है, वह अद्भुत है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को भूल जाइए, लखनऊ, पटना और जयपुर जैसी राजधानियों को भी भूल जाइए, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों तक के युवा, बुजुर्ग, बच्चे फेसबुक पर आ जमे हैं और खूब सारी बातें कर रहे हैं- हिंदी में। सोशल नेटवर्कों की हिंदी भी अपने आप में विलक्षण है- हिंदी, अंग्रेजी, देशज, तकनीकी, चित्रात्मक और अनौचपारिक शब्दावली से भरी हुई। लेकिन है बहुत दिलचस्प। आप चाहें तो इस हिंदी का छिद्रान्वेषण कर उसकी भाषायी सीमाओं, त्रुटियों और विसंगतियों पर थीसिस लिख सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी के प्रसार में दिलचस्पी रखते हैं तो यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह है तो हिंदी ही। शायद हिंदी की एक अलग खुशबू। कौन जाने आगे चलकर सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग से उपजी शब्दावली, वाक्य-विन्यास और भाषिक प्रवृत्तियाँ मुख्यधारा की हिंदी पर भी कोई न कोई असर डालें।


आप चाहें तो सोशल नेटवर्किंग की हिंदी का छिद्रान्वेषण कर उसकी भाषायी सीमाओं, त्रुटियों और विसंगतियों पर थीसिस लिख सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी के प्रसार में दिलचस्पी रखते हैं तो यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह है तो हिंदी ही।


पिछले तीन-चार साल में यदि तकनीकी दुनिया में हिंदी से जुड़ी कोई क्रांति दिखाई देती है तो वह है सोशल नेटवर्किंग की क्रांति। चूँकि संदेशों का आदान-प्रदान नेटवर्किंग की मूलभूत अनिवार्यता और पहचान है, इसलिए वह एक से दो, दो से चार लोगों को आपस में संपर्क करने के लिए प्रेरित कर रही है। और संदेश जब तक अपनी भाषा में न हों, अपने आसपास के परिवेश से जुड़े हुए न हों तब तक न तो बात कहने वाले को तसल्ली देते हैं और न ही उसे सुनने वाले को। अंग्रेजी में संदेश भेजकर देखिए। अगर आपकी मातृभाषा हिंदी है तो आपको एक कसक सी महसूस होगी। लगेगा कि अभिव्यक्ति में वह बात नहीं आई। लेकिन उसी को हिंदी, बंगला, गुजराती या तमिल में भेजकर देखिए तो सुकून महसूस होगा। अपनी मातृभाषा माँ के समान है, जिसके साथ कोई संकोच, कोई परदा, कोई औपचारिकता और कोई आडम्बर करने की जरूरत नहीं है। जैसा सोचते हैं, वैसा लिख सकते हैं। तकनीकी दुनिया में हिंदी जैसी भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए फेसबुक एक बहुत अच्छा उपकरण सिद्ध हो सकता है।
हजारों लोग जो हिंदी में टाइपिंग करना नहीं जानते थे, वे सिर्फ इसलिए टाइपिंग के टूल्स की तलाश में लगे हैं ताकि वे हिंदी में संदेश भेज सकें। दूसरे हजारों लोग ऐसा सफलतापूर्वक कर भी चुके हैं। बहुतों ने खास तौर पर इसीलिए हिंदी में टाइपिंग सीखी है। उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियाँ हिंदी की समन्वित शक्ति में इजाफ़ा कर रही हैं।
क्या सोशल नेटवर्किंग हमारी भाषा को विकृत भी कर रही है? हाँ, यकीनन। क्योंकि जिस अंदाज में वह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है, उसमें प्रयुक्त भाषा का बहाव दैनिक जीवन तक भी होना स्वाभाविक है। बहुत से लोग धीरे-धीरे उन शब्दों को अपना लेंगे जिनकी रचना फेसबुक की उर्वर भूमि पर हुआ है। किंतु यह भाषा पर है कि वह किस समझदारी के साथ अपने आपको विकृतियों से मुक्त रखते हुए नए शब्दों को अपनाती है। आवश्यक नहीं कि ये शब्द परिनिष्ठित हिंदी का हिस्सा बनें लेकिन हमारी समग्र शब्दावली का हिस्सा वे जरूर बन सकते हैं क्योंकि भाषा वही आगे बढ़ती है जो तरल और बहती हुई है, जो नए तत्वों से वितृष्णा नहीं रखती बल्कि ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देहि उड़ाय’ वाली प्रवृत्ति से युक्त है।
अभिव्यक्ति की बेचैनी
हिंदी में अभिव्यक्ति की उत्कंठा सिर्फ यहीं नहीं है। जहाँ कहीं भी संचार की आवश्यकता है, वहाँ-वहाँ यह उत्कंठा, यह आकांक्षा, यह बेचैनी दिखाई देती है। इंटरनेट के संदर्भ में मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि कन्टेन्ट या विषय वस्तु ने हिंदी का जितना प्रसार किया है, उससे कहीं अधिक उसका प्रसार संचार के तकनीकी साधनों ने किया है। आज टैबलेट्स और स्मार्टफोन्स के युग में भी हम उसी परिघटना को अनुभव कर रहे हैं जो कुछ साल से सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग के संदर्भ में देखते आए थे।
भारत में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी हुई है, शिक्षा का भी प्रसार हुआ है और तकनीकी चीज़ों के प्रति संदेह का भाव कम हुआ है। ये चीजें आर्थिक दृष्टि से भी लोगों की पहुँच में आ रही हैं। उसी के साथ-साथ संवाद की जरूरत भी पढ़ रही है और वहाँ अपनी भाषा की जरूरत पड़ ही जाती है। लोग लंबे समय तक रोमन में एसएमएस मोबाइल संदेश भेजते रहे सिर्फ इसलिए कि उनके मोबाइल फोन में हिंदी टाइप करने का कोई जरिया नहीं था और बिना हिंदी में अपनी बात कहे संतुष्टि नहीं होती। इस बीच मोबाइल फोन, खासकर स्मार्टफोन की क्षमता बढ़ी है तो उनमें एक से अधिक भाषाओं की सुविधाएँ समाहित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया है। कोई तकनीकी रुकावट नहीं है। अगर रुकावट है तो कंपनियों के स्तर पर, जो अलग-अलग उत्पाद को अलग-अलग वर्ग को ध्यान में रखकर बाजार में उतारती हैं। उन्हें लगता है कि किसी खास मोबाइल फोन में हिंदी होनी जरूरी है क्योंकि यह आम लोगों तक पहुँचने वाला है। दूसरी ओर कुछ महँगे, आधुनिक और स्मार्ट किस्म के फोन्स में हिंदी टेक्स्ट इनपुट की अनिवार्यता उन्हें महसूस नहीं होती क्योंकि उन्हें लगता है कि जो वर्ग इन्हें खरीदने वाला है वह तो पहले ही अंग्रेजीदाँ बन चुका है, और उसे हिंदी में संदेश भेजने की क्या जरूरत पड़ेगी? जैसे-जैसे हम खाँटी हिंदी प्रेमियों की आर्थिक क्षमता बढ़ रही है, उनकी यह धारणा टूटेगी और एक-एक कर सब हिंदी की शरण में आ जाएंगे। हिंदी के पास संख्या बल और बाजार जो है।
ब्लॉगिंग पर दबाव
ब्लॉगिंग पर इन दिनों नए पाठकों तो आकर्षित करने, अपने कन्टेन्ट की ताजगी बनाए रखने और मोटीवेशन बनाए रखने का दबाव है। सोशल नेटवर्किंग के लोकप्रिय होने का प्रभाव ब्लॉगिंग पर पड़ा है और उसमें जिस तेजी के साथ विस्तार आ रहा था, वह गति मंद पड़ी है। कारण, सोशल नेटवर्किंग अपने दोस्तों के साथ जुड़े रहते हुए अपनी बात कहने का मौका देता है और अपेक्षाकृत अधिक सुलभ तथा आसान है। वहाँ आप जो टिप्पणी कर रहे हैं, वह छोटी सी, अनौपचारिक भी हो सकती है और दूसरों की टिप्पणियाँ भी इस्तेमाल और शेयर की जा सकती हैं इसलिए अच्छा लिखने का दबाव नहीं है। इस वजह से हर कोई सोशल नेटवर्किंग में कुछ न कुछ कह देता है। ब्लॉगिंग के साथ ऐसा नहीं है। वह अधिक गंभीर और अधिक रचनात्मक माध्यम है। दूसरे, जो लोग सोशल नेटवर्किंग पर सक्रिय हैं, उनके लिए फिर ब्लॉगिंग पर भी सक्रिय बने रहना ज्यादा समयसाध्य हो जाता है जिससे ब्लॉगिंग की विकास दर के साथ-साथ ब्लॉगों के अपडेशन की स्थिति प्रभावित हो रही है।
हालाँकि कुछ हद तक इसका अप्रत्यक्ष लाभ हिंदी से ही जुड़े कुछ दूसरे क्षेत्रों को हुआ है, जैसे ई-मैगजीन्स या वेबसाइटें को। ब्लॉगिंग की दुनिया में मजबूत जगह बना चुके चेहरों को अब यह माध्यम थोड़ा छोटा लगने लगा है और वे अपनी वेब-मौजूदगी को अपग्रेड करने में जुटे हैं। नतीजा है, हिंदी में नई-नई, ताजगी से भरी वेबसाइटों का आगमन। इनमें मोहल्ला, भड़ास4मीडिया, विस्फोट, तरकश, नुक्कड़, मीडिया खबर, देशकाल, जनादेश, डेटलाइन इंडिया, परिकल्पना, हस्तक्षेप, प्रवक्ता, हिंदी होमपेज, सामयिकी, हिंद युग्म, मीडिया दरबार, चौराहा, मीडिया सरकार, चौराहा, फुरसतिया, सृजनगाथा, युगजमाना, जनता जनार्दन, अर्थ काम, साहित्य कुंज, साहित्य शिल्पी, तकनीक.ऑर्ग वगैरह शामिल हैं। देखते ही देखते ब्लॉगिंग समुदाय की बदौलत हिंदी में विविधताओं से भरी सामग्री की धारा बह निकली है जो बहुत सजीव, जीवंत और हिंदी की विशुद्ध खुशबू लिए हुए है। हिंदी जगत में जिस किस्म के विवाद, धमाल, उठापटक, हंगामे और बहसें यहाँ पर भी हैं और शायद इसीलिए इन सबको पढ़ना खाँटी हिंदी पाठक के लिए अधिक रुचिकर भी है। किसी घटना को कई कोणों से देखना पढ़ना और समझना चाहते हैं तो हिंदी के युवाओं के उल्लास और रचनाकर्म से भरी इन वेबसाइटों पर एक नज़र जरूर डालिए. -  बालेन्दु शर्मा दाधीच                                                     

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